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We have daily sunday sessions of youth under the name Sree Chaitanya Sankirtan Yuva Sangh where we have discussions on various spiritual topics related to our Gaudiya philosophy.

16/08/2026
16/08/2026

*श्री चैतन्य संकीर्तन युवा संघ द्वारा प्रति रविवार आयोजित कार्यक्रम*

विषय:- श्री झूलन यात्रा।

*श्रीरघुनन्दन ठाकुर जी की*                 *तिरोभाव तिथि पर विशेष*       श्रीकृष्ण के प्रियनर्म सखा होकर व्रज में श्रीरा...
16/08/2026

*श्रीरघुनन्दन ठाकुर जी की*
*तिरोभाव तिथि पर विशेष*

श्रीकृष्ण के प्रियनर्म सखा होकर व्रज में श्रीराधामाधव जी की लीला में सहायता करने वाले प्रद्युम्न जी, श्रीचैतन्य लीला में रघुनन्दन बने हैं......... श्रीरघुनंदन जी के पिताजी का नाम श्रीमुकुंद दास है।

श्रीमुकुंद दास अपने घर पर भगवान गोपीनाथ जी की सेवा करते थे। एक बार उनको किसी कार्य के लिए बाहर जाना था। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र रघुनन्दन को कहा कि आज तुम गोपीनाथ जी को भोग लगवा देना।

रघुनन्दन अभी बचपन की बाल्य अवस्था में थे, सो सरल भाव से गोपीनाथ जी को बोलने लगे खाओ......... लो खाओ .....लो खाओ......गोपीनाथ जी तो
प्रेम के वश में हैं, उन्होंने सारा भोग खा लिया।

जब मुकुंद दास जी लौटे और प्रसाद के लिए पूछा तो रघुनंदन जी ने कहा वो तो गोपीनाथ जी सारा खा गए। यह सुनकर मकुन्द जी विस्मित हो गए। फिर किसी और दिन वह रघुनंदन जी को सेवा देकर खुद मंदिर के बाहर छिप गए।

इधर बड़ी प्रसन्नता के साथ रघुनंदन जी ने अपने हाथ से गोपीनाथ जी को लड्डू दिया।
श्रीगोपीनाथ जी ने जब आधा लड्डू खा लिया तो उसी समय श्री मुकुंद जी कमरे में देखने के लिए आ गए। आधा लड्डू जो बच गया था, उसे श्रीगोपीनाथ जी ने नहीं खाया। यह देखकर मुकुंद जी प्रेम में विभोर हो गए और अति प्रसन्न होकर रघुनन्दन को गोद में उठा लिया। कौन ऐसा है जो ऐसे परम वैष्णव का यश नहीं गायेगा।

*श्रील वंशीदास बाबा जी की*                          *आज तिरोभाव तिथि है।*  श्रील वंशीदास बाबा जी अवधूत परमहंस वैष्णव थे।...
16/08/2026

*श्रील वंशीदास बाबा जी की*
*आज तिरोभाव तिथि है।*

श्रील वंशीदास बाबा जी अवधूत परमहंस वैष्णव थे। श्रीवंशीदास बाबा जी ने श्रील गौर किशोर दास बाबा जी से बाबा जी वेश लिया था।

एक बार की बात है कि एक व्यक्ति प्रतिदिन बाबा जी के पास आता और पूछता कि भगवान की प्राप्ति कैसे होगी?

बाबा जी महाराज चुप ही रहते थे, ज्यादा कुछ नहीं बोलते थे। उस व्यक्ति के बार - बार पूछने पर बाबा जी ने सिर्फ इतना ही बोला―रोना अर्थात् जब तक भगवान के लिए रोना नहीं आएगा तब तक भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होगी।

श्री वंशीदास बाबा जी महाराज जहां भी कहीं वट वृक्ष देखते थे, उसे वृंदावन का वंशीवट समझ कर उसके नीचे बैठ जाया करते थे।

उनके पास कपड़े के दो झोले थे .......एक झोले में वे निताई-गौरांग और दूसरे झोले में श्रीराधा-गोविंद जी की मूर्तियां रखते थे। वे नित्य उनकी पूजा करते थे।

झोले से मूर्तियां निकाल कर मन-मन में मंत्रादि जप करते हुए भाव के साथ पूजा करने के पश्चात फिर उन मूर्तियों को उन्हीं झोले में रख देते थे।

आज ऐसे परमहंस अवधूत वैष्णव की अप्रकट तिथि पर दंडवत् प्रणाम करते हुए उनकी कृपा प्रार्थना करते हैं।

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