13/05/2026
*अपने बच्चों को कोचिंग संस्थाओं की बजाय स्थानीय स्कूलों में पढ़ाओ, उसे खुद को मृत्युदंड दे सके इस लायक बनाने के लिए बड़े शहरों में मत भेजो*
आज पूरे भारत में शिक्षा के नाम पर एक ऐसा भ्रम खड़ा कर दिया गया है, जिसने लाखों माता-पिताओं को मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से जकड़ लिया है,हर गली, हर शहर और हर मोबाइल स्क्रीन पर बड़े-बड़े कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन दिखाई देते हैं, जिनमें सैकड़ों टॉपर्स की तस्वीरें, हजारों चयन और करोड़ों के पैकेज का सपना दिखाया जाता है,ऐसा माहौल बना दिया गया है कि यदि बच्चा किसी बड़े कोचिंग शहर में नहीं गया, तो उसका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा,यही कारण है कि आज गांवों और छोटे शहरों के माता-पिता अपनी वर्षों की जमा पूंजी, खेत, गहने और जमीन तक बेचकर बच्चों को तथाकथित “एजुकेशन हब” भेज रहे हैं,लेकिन अब समय आ गया है कि देश इस चमकती हुई तस्वीर के पीछे छिपी भयावह सच्चाई को समझे।
पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार कुछ कोचिंग संस्थानों ने अचानक चमत्कारी परिणाम देने शुरू किए, उसने पूरे समाज को आकर्षित कर लिया, हजारों बच्चों का चयन, अखबारों में पूरे पन्ने के विज्ञापन, सोशल मीडिया पर सफलता की कहानियां और शहरों को शिक्षा नगरी घोषित करने का अभियान यह सब देखकर आम परिवारों को लगा कि यहीं से सफलता का रास्ता निकलता है, लेकिन जब विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, संदिग्ध चयन और गेस पेपर जैसी घटनाएं सामने आने लगीं, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक था कि आखिर इतने चमत्कार संभव कैसे हो रहे हैं,आज समाज के सामने यह गंभीर आरोप खड़े हैं कि कुछ बड़ी कोचिंग संस्थाएं पेपर लीक करवाने वाले माफियाओं से करोड़ों रुपए में प्रश्नपत्र खरीदती हैं और फिर उन्हें “स्पेशल बैच”, “गेस पेपर”, “रिवीजन मॉड्यूल” या “गारंटीड बैच” के नाम पर चुनिंदा बच्चों तक पहुंचा देती हैं,यही कारण है कि कुछ सौ बच्चों के चयन का ढोल पीटकर लाखों परिवारों को भ्रमित किया जाता है और फिर उन परिणामों के आधार पर हजारों नए एडमिशन लेकर अरबों रुपए का व्यापार खड़ा किया जाता है।
सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के बच्चों का होता है, जिन बच्चों को बड़े सपनों के साथ घर से दूर भेजा जाता है, वे वहां जाकर शिक्षा नहीं बल्कि भय, तनाव और तुलना की मशीन में फंस जाते हैं,हजारों बच्चों की भीड़ में उन्हें केवल “रैंक” बनकर रह जाना पड़ता है,हर सप्ताह टेस्ट, हर महीने रैंकिंग, हर दिन तुलना और हर गलती पर अपमान धीरे-धीरे बच्चा पढ़ाई से ज्यादा असफलता के डर में जीने लगता है, उसे यह महसूस कराया जाता है कि यदि वह डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बना, तो उसका जीवन व्यर्थ है,यही मानसिक दबाव कई मासूम बच्चों को अवसाद और आत्महत्या जैसे भयावह रास्तों तक ले जाता है,कितने ही माता-पिता अपने बच्चों की लाशें लेकर लौटे हैं, लेकिन इसके बावजूद यह शिक्षा व्यापार लगातार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि इन संस्थानों ने सफलता को “ब्रांड” बना दिया है और बच्चों को “प्रोडक्ट”।
विडंबना देखिए कि जिन बच्चों के माता पिता दिन रात मेहनत करके फीस भरते हैं, उन्हीं गरीब परिवारों के सपनों पर इन संस्थाओं की आलीशान इमारतें खड़ी होती हैं,यदि इन कोचिंग साम्राज्यों को निचोड़ा जाए, तो उनमें से गरीबों का खून और माता पिता के आंसू ही निकलेंगे,शिक्षा अब सेवा नहीं रही, बल्कि करोड़ों अरबों के व्यापार में बदल दी गई है,बच्चों की मेहनत से ज्यादा विज्ञापन पर ध्यान दिया जाता है,एक टॉपर के पोस्टर से हजारों नए बच्चों को आकर्षित किया जाता है, जबकि असफल हुए लाखों बच्चों की पीड़ा को कोई नहीं दिखाता,यह कैसी शिक्षा है, जहां बच्चे इंसान नहीं बल्कि रिजल्ट मशीन बन जाते हैं...।
इसीलिए आज पूरे भारत के माता पिताओं से हाथ जोड़कर निवेदन है कि अपने बच्चों को कक्षा 12 तक अपने पास रखिए , उन्हें स्थानीय विद्यालयों में पढ़ाइए, क्योंकि वास्तविक शिक्षा केवल किताबों से नहीं, बल्कि परिवार, समाज और संस्कारों से मिलती है,गांवों, कस्बों और छोटे शहरों के विद्यालय किसी भी प्रकार से कमज़ोर नहीं हैं,वहां भी योग्य शिक्षक हैं, अनुभवी व्याख्याता हैं, अनुशासन है और सबसे बड़ी बात वहां बच्चों को इंसान समझा जाता है, ग्राहक नहीं, स्थानीय विद्यालयों में पढ़ने वाला बच्चा अपने माता-पिता के सान्निध्य में रहता है, परिवार के संस्कार सीखता है, समाज से जुड़ा रहता है और मानसिक रूप से अधिक मजबूत बनता है, उसे यह एहसास रहता है कि उसका अस्तित्व केवल किसी परीक्षा की रैंक तक सीमित नहीं है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि स्थानीय स्कूलों की महानता को फिर से पहचाना जाए,हमारे अपने शहरों और गांवों के विद्यालय केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि चरित्र निर्माण करते हैं, वहां बच्चे एक-दूसरे के साथ सामाजिक व्यवहार सीखते हैं, अपने बुजुर्गों का सम्मान करना सीखते हैं, त्योहारों और संस्कृतियों से जुड़े रहते हैं और जीवन के वास्तविक मूल्यों को समझते हैं, स्थानीय शिक्षक बच्चों को केवल पढ़ाते नहीं, बल्कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, उनकी समस्याओं को समझते हैं और अभिभावकों के साथ मिलकर उनका मार्गदर्शन करते हैं, यही वह वातावरण है जहां बच्चा मानसिक रूप से स्वस्थ, सामाजिक रूप से जागरूक और नैतिक रूप से मजबूत बनता है।
इसके विपरीत बड़े कोचिंग शहरों में बच्चों को परिवार से काट दिया जाता है, वहां न त्योहार होते हैं, न अपनापन, न भावनात्मक सहारा,वहां केवल प्रतियोगिता है, भागदौड़ है और हर पल खुद को साबित करने का दबाव है,धीरे-धीरे बच्चा मशीन बन जाता है,वह दोस्ती भूल जाता है, संवेदनाएं भूल जाता है और जीवन का वास्तविक अर्थ खो देता है,यदि शिक्षा बच्चों को मानसिक रूप से तोड़ने लगे, उन्हें अवसाद में धकेलने लगे और उन्हें केवल पैकेज और रैंक का साधन बना दे, तो ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
अब समय आ गया है कि सरकारें भी इस दिशा में कठोर कदम उठाएं, शिक्षा के नाम पर भय और भ्रम फैलाने वाली संस्थाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए,पेपर लीक माफियाओं से जुड़े नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए,बच्चों पर अमानवीय दबाव डालने वाले सिस्टम को नियंत्रित किया जाना चाहिए और शिक्षा को व्यापार बनाने वालों पर सख्त नियम लागू होने चाहिए, क्योंकि शिक्षा मंदिर होती है, व्यापार का बाजार नहीं, यह राष्ट्र निर्माण का माध्यम है, बच्चों के सपनों का शोषण करने का उद्योग नहीं।
हर माता-पिता को यह समझना होगा कि सफलता केवल बड़े शहरों से नहीं आती, बल्कि मेहनत, अनुशासन और सही मार्गदर्शन से आती है, यदि बच्चा ईमानदारी से पढ़े, स्थानीय विद्यालयों में अच्छे शिक्षकों के मार्गदर्शन में आगे बढ़े और परिवार का सहयोग उसके साथ हो, तो वह कहीं से भी डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या वैज्ञानिक बन सकता है, भारत के महान लोग केवल बड़े कोचिंग संस्थानों से नहीं निकले, बल्कि साधारण विद्यालयों और संघर्षपूर्ण जीवन से निकलकर आगे बढ़े हैं।
इसलिए अपने बच्चों के मन में यह भ्रम कभी मत डालिए कि सफल होने के लिए घर छोड़ना जरूरी है,उन्हें यह सिखाइए कि उनका जीवन किसी परीक्षा से बड़ा है,उन्हें यह एहसास करवाइए कि वे परिवार के लिए कितने अनमोल हैं, क्योंकि अंत में रैंक नहीं, इंसानियत काम आती है ,पैकेज नहीं, संस्कार काम आते हैं,और सबसे बड़ी बात बच्चों की मुस्कान किसी भी सफलता से अधिक मूल्यवान होती है।
प्रमोद नामदेव, बिलाड़ा 🙏