ब्रम्हा, विष्णु, महेश

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ब्रम्हा, विष्णु, महेश जोकि त्रिलोकी तथा अखिल ब्रम्हांड के स्वामी है. एक होते हुए भी तीन अलग अलग रूपों में दिखाई देते है तथा इन के अतिरिक्त भी अन्य रूपों में प्रकट होकर नाना प्रकार की लीलाएँ करते है तथा अपने भक्तों का उद्धार करते है. आप चाहे किसी भी प्रभु के अनुयायी क्यों न हो, वे भी इन्ही के स्वरुप है. ब्रम्हा इस समस्त सृष्टि व चराचर जीवों के रचयिता, विष्णु पालन करने वाले तथा शिव संहार करने वाले ह

ै. शास्त्रों, वेदों व पुरानों में इन प्रभु के लिए जो कहा गया है वो में आपके संमुख प्रस्तुत करता हूँ..
ब्रम्हा,विष्णु,शिव ,राम ,कृष्ण आदि में बिलकुल भी भेद नहीं है ... ये एकरूप व एकतत्व ही है ... परमब्रम्ह ही माया के प्रादुर्भाव से स्वयं को तीन रूपो में प्रकट करता है ब्रम्हा,विष्णु ,महेश ...अतः कोई व्यक्ति इनमे से किसी एक का भक्त बनते हुये दूसरे की निंदा करता है वो अज्ञानतावश वह एक तरह से अपने ही इष्ट की निंदा करता है...भक्तजन इनमे भेद करके भ्रमित और नरकगामी न हो इसलिए समस्त ग्रंथो में इससे संबन्धित श्लोक दिये हुये है ... और यहा तक कि स्वयं ब्रम्हा,विष्णु,शिव,राम,कृष्ण ने भी अपने मुख से कहा है कि हम सब भिन्न-भिन्न स्वरूप के होकर भी एक ही है .... लेशमात्र भी भेद नहीं .... फिर भी दुर्बुद्धि व इष्टतव से अन्जान अज्ञानी इनमे भेद समझता है .... वो प्रभु कृपा से वंचित हो नरक में वास करता है और अशांति को ही प्राप्त होता है .अतः हमे ईश्वर के किसी एक स्वरूप को इष्ट मानकर भी समस्त स्वरूपो के प्रति श्रद्धा एक एकतत्व का भाव रखकर भक्ति मार्ग पर चलना चाहिए .... हालांकि ग्रंथो व शास्त्रो में इनकी एकात्मकता के अनेकों उदाहरण है ... पर कुछ मुख्य उदाहरण प्रस्तुत है -
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एते परस्परोत्पन्नाधारयन्ति परस्परम ।
परस्परेण वर्धन्ते परस्परमनुव्रता: ॥
कचिद्रहा कचिद्विष्णु: कचिद्रुद्र: प्रशस्यते ।
नानेव तेषामाधिक्यमैश्वर्ये चातिरिच्यते ॥ ........................ (शिवपुराण )
अर्थात - ये तीनों ब्रम्हा विष्णु महेश एक दूसरे से उत्पन्न हुये है , एक दूसरे को धारण करते है , एक दूसरे के द्वारा वृद्धिगत होते है और एक दूसरे के अनुकूल आचरण करते है... कही ब्रम्हा की प्रशंशा की जाती है तो कही विष्णु की व कही शिव की ... इनका उत्कर्ष एवं ऐश्वर्य एक दूसरे की अपेक्षा इस प्रकार अधिक कहा है मानो वे अनेक हो... जो संशयात्मा मनुष्य यह विचार करते है कि अमुक बड़ा है व अमुक छोटा है वे अगले जन्म में पिशाचयोनि अथवा राक्षस(नास्तिक या मुस्लिम) होते है ... इसमे संशय नहीं है ।
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आगे स्वयं भगवान शिव विष्णु से कहते है कि -
मद्दर्शने फलं यद्दे तदेव तव दर्शने ।
ममेव हदये विष्णुर्विष्णोंश्च्र हदये ह्वाहम ॥
उभयोरंतरं यो वै जानाति मतो मम । ..................(शिवपुराण , ४ । ६१- ६२ )
अर्थात - "मेरे दर्शन का जो फल है वही आपके दर्शन का है .... आप मेरे हदय में निवास करते हो और में आपके हदय में रहता हू ... जो हम दोनों में भेद नहीं समझता ... वही मुझे मान्य है ... "
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इसी तरह भगवान श्री कृष्ण शिव जी से कहते है -
त्वत्परों नास्ति मे प्रेयांस्त्वं मदीयात्मन: पर: ।
ये त्वां निन्दन्ति पापिस्ठा ज्ञानहीना विचेतस: ॥
पच्यन्ते कालसूत्रेण याव्श्चन्द्रदिवाकरौ ।
कृत्वा लिङ्ग सकृत्पूज़्यं वसेत्कल्पायुतं दिवि ॥ ....... (ब्रम्हवैवर्त पुराण , भागवत .... नज्ञांश )
अर्थात - भगवान श्री कृष्ण विष्णु से बोले - " मुझे आपसे बढ़कर कोई प्यारा नहीं है... आप मुझे अपनी आत्मा से भी अधिक प्रिय है...जो पापी, अज्ञानी एवं बुद्धिहीन पुरुष आपकी निंदा करते है (चाहे वे मेरे भक्त ही क्यो न हो ) ... वे कल्प तक कालसूत्र में नर्क में पड़े रहेंगे ... जो शिवलिंग का निर्माण कर एक बार भी उसकी पूजा कर लेता है .... वह दस हजार कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है .....
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भगवान विष्णु भी कहते है -
त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम ।
सर्वभूतात्मनां ब्रम्हान स शांतिमधिगच्छति ॥ ........... (श्रीमद भागवत पुराण )
अर्थात - " हे विप्र हम तीनों एकरूप है और समस्त भूतो की आत्मा है , हमारे अंदर जो भेव-भावना नहीं करता , निसंदेह वह ही शांति(मोक्ष) को प्राप्त करता है "
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श्री रामचरित मानस (वाल्मीकिरामायण में भी ) श्री राम कहते है -
संकरप्रिय मम द्रोही , सिवद्रोही मम दास ।
ते नर करहि कलपभरि घोर नरकमहँ वास ॥ ........... (तुलसीकृत रामायण )
अतः निष्काम व निस्वार्थ भाव से भगवान के समस्त स्वरूपो को एक मानते हुये ही भक्ति मार्ग पर चलना चाहिए ... श्री विष्णवे नमः
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