05/04/2026
कैंसर निर्मूलन की वैश्विक और भारतीय उपाय योजनाएँ: धन, दुर्दशा और दिशा - एक विश्लेषणात्मक लेख।
एक महामारी जो चुपचाप बढ़ती है -
कैंसर आज विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। यह न केवल शरीर को नष्ट करता है, बल्कि परिवारों को आर्थिक रूप से तबाह कर देता है और समाज को एक अदृश्य घाव देता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमान के अनुसार विश्वभर में प्रतिवर्ष लगभग 2 करोड़ नए कैंसर के मामले सामने आते हैं और इनमें से एक करोड़ से अधिक मृत्यु होती हैं। भारत में यह संख्या प्रतिवर्ष लगभग 14-15 लाख नए मामलों और 8 लाख से अधिक मृत्यु के रूप में प्रकट होती है।
इस संकट से निपटने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी दोनों स्तरों पर प्रयास हुए हैं। लेकिन जब हम इन प्रयासों की आंतरिक संरचना, वित्तीय स्थिति और दीर्घकालिक स्थिरता को गहराई से देखते हैं, तो एक असुविधाजनक सच्चाई उभरती है कि ये प्रयास उतने सुदृढ़ नहीं हैं जितने दिखते हैं।
भाग १: वैश्विक परिदृश्य - सरकारी प्रयास और उनकी सीमाएँ -
१.१ विश्व स्वास्थ्य संगठन और वैश्विक प्रतिबद्धताएँ
WHO का "Global Action Plan for NCDs" और कैंसर नियंत्रण की रूपरेखा सैद्धांतिक रूप से मजबूत है। सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन के लिए WHO ने 90-70-90 लक्ष्य रखा है, 90% बालिकाओं का HPV टीकाकरण, 70% महिलाओं की स्क्रीनिंग, और 90% मामलों का उपचार। इस दिशा में 2024 में कोलम्बिया के कार्टाजेना शहर में आयोजित वैश्विक फोरम में लगभग 60 करोड़ अमेरिकी डॉलर की नई प्रतिबद्धताएँ घोषित हुईं, जिनमें Bill & Melinda Gates Foundation से 18 करोड़, UNICEF से 1 करोड़, और विश्व बैंक से 40 करोड़ डॉलर शामिल थे।
यह आँकड़ा बड़ा लगता है, परन्तु वास्तविकता यह है कि 2022 में सर्वाइकल कैंसर से हुई अनुमानित 3.48 लाख मौतों में से 90% से अधिक निम्न और मध्यम आय वाले देशों (LMICs) में हुईं, जहाँ 5% से भी कम महिलाओं की कभी स्क्रीनिंग हो पाती है।
१.२ अमेरिकी NCI और उन्नत राष्ट्रों का मॉडल
अमेरिका में National Cancer Institute (NCI) और उसके अंतर्गत DCCPS (Division of Cancer Control and Population Sciences) विश्व का सबसे सुव्यवस्थित सरकारी कैंसर कार्यक्रम है। वित्त वर्ष 2024 में DCCPS ने लगभग 925 अनुसंधान अनुदानों के माध्यम से लगभग 58.3 करोड़ डॉलर का निवेश किया। (National Cancer Institute) इस दीर्घकालिक निवेश के परिणामस्वरूप 1991 से 2021 के बीच अमेरिका में कैंसर से होने वाली मृत्यु दर में 33% की गिरावट आई, जिससे 41 लाख से अधिक जीवन बचाए जा सके।
किन्तु 2025 में इस सफलता की नींव पर एक बड़ा संकट आया। ट्रम्प प्रशासन द्वारा NIH (National Institutes of Health) के बजट में की गई भारी कटौती ने अमेरिका में कैंसर अनुसंधान को गहरे संकट में डाल दिया। एक NIH-वित्तपोषित नैदानिक परीक्षण 10 सप्ताह तक रुका रहा, जिससे Stage 4 सिर-और-गर्दन के कैंसर के एक मरीज को अनिश्चितता में जीना पड़ा। (American Association for Cancer Research)
यह तथ्य एक महत्वपूर्ण सबक देता है — सरकारी बजट राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर है, और जब राजनीति बदलती है, मरीज भुगतते हैं।
१.३ वैश्विक वित्त की विषमता - एक कड़वी सच्चाई
2025 की एक समीक्षा ने उजागर किया कि 2016-2023 के बीच कैंसर अनुसंधान अनुदानों के कुल $51.4 अरब में से केवल $8.4 मिलियन (0.1%) ही निम्न और मध्यम आय वाले देशों को मिले। (The Lancet) यह आँकड़ा वैश्विक न्याय की विफलता का प्रमाण है। भू-राजनीतिक अस्थिरता और घटते अंतरराष्ट्रीय सहयोग के इस दौर में सरकारों ने अंतर्राष्ट्रीय सहायता काफी कम कर दी है, जबकि LMICs में कैंसर की दर लगातार बढ़ रही है।
भाग २: भारतीय परिदृश्य — सरकारी ढाँचा और उसकी ज़मीनी हकीकत
२.१ प्रमुख सरकारी योजनाएँ
भारत सरकार ने कैंसर नियंत्रण हेतु कई योजनाएँ चलाई हैं। इनकी एक संक्षिप्त झलक:
NPCDCS (National Programme for Prevention and Control of Cancer, Diabetes, CVDs and Stroke): 2010 में शुरू इस कार्यक्रम का केंद्र बिंदु कैंसर सहित प्रमुख गैर-संचारी रोगों की रोकथाम, शीघ्र जाँच और उपचार अवसंरचना है। (National Health Mission) इसके तहत 682 जिला NCD क्लीनिक, 191 जिला कार्डियक केयर यूनिट और 5408 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र NCD क्लीनिक स्थापित हो चुके हैं। (Press Information Bureau)
Ayushman Bharat (PMJAY): 2018 में शुरू इस योजना के अंतर्गत कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और कैंसर शल्य चिकित्सा का कवरेज दिया गया है। 2024 तक पंजीकृत कैंसर मरीजों में से 90% से अधिक ने इस योजना के तहत उपचार शुरू किया।
स्वास्थ्य मंत्री कैंसर रोगी कोष (HMCPF): इस कोष के तहत गरीबी रेखा से नीचे के मरीजों को ₹5 लाख तक की सहायता मिलती है, अधिकतम ₹15 लाख तक। यह 27 क्षेत्रीय कैंसर केंद्रों (RCCs) को कवर करता है जिनमें से प्रत्येक को ₹50 लाख का रिवॉल्विंग फंड आवंटित है। (Pib)
बजट 2025-26 में नई घोषणाएँ: 200 Day Care Cancer Centres की स्थापना 2025-26 में होनी है, और 36 जीवनरक्षक दवाओं को सीमा शुल्क से पूरी छूट दी गई है। (Translate)
National Cancer Grid (NCG): 2012 में स्थापित इस ग्रिड का उद्देश्य पूरे भारत में उच्च गुणवत्ता और मानकीकृत कैंसर उपचार सुनिश्चित करना है।
२.२ योजनाओं की कागजी और जमीनी खाई
यहाँ कुछ कठोर सत्य कहने आवश्यक हैं: -
पहला:
NPCDCS के लिए 2021-22 में NHM के अंतर्गत राज्यों को जारी कुल राशि ₹56,118 लाख (लगभग ₹561 करोड़) थी (Press Information Bureau) — यह भारत की 140 करोड़ जनसंख्या और 14 लाख वार्षिक नए कैंसर मामलों के सापेक्ष एक बेहद अपर्याप्त राशि है।
दूसरा:
राज्यों को केंद्र से फंड का वितरण तो आमतौर पर समय पर होता है, लेकिन राज्यों से जिलों तक का आवंटन अक्सर विलंबित और अपर्याप्त रहता है। (PubMed Central)
तीसरा:
NPCDCS की स्क्रीनिंग नीति मुख्यतः अवसरवादी (opportunistic) रही है — अर्थात् जो मरीज स्वयं आए, उन्हें जाँचा गया। सक्रिय जनसंख्या-आधारित स्क्रीनिंग अभी भी बड़े पैमाने पर लागू नहीं हो सकी है। (PubMed Central)
चौथा:
ग्रामीण भारत में ऑन्कोलॉजिस्ट की भारी कमी, उपकरणों की अनुपलब्धता, और रेडियोथेरेपी मशीनों का जिला स्तर पर न होना — ये सब ऐसी संरचनात्मक कमियाँ हैं जो योजनाओं को कागजों पर सुंदर और जमीन पर खोखला बना देती हैं।
भाग ३: गैर-सरकारी संस्थाएँ (NGOs) — भूमिका, आर्थिक स्थिति और संकट।
३.१ NGOs की अपरिहार्य भूमिका -
जहाँ सरकारी तंत्र पहुँचने में असमर्थ है, वहाँ NGOs ने एक महत्वपूर्ण रिक्तता भरी है। भारत में NGOs कैंसर मरीजों को मुफ्त परामर्श, घर-आधारित उपशामक देखभाल (palliative care), पोषण सहायता, दवाएँ, और आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं — ये सब ऐसी सेवाएँ हैं जिन्हें अस्पतालों का तंत्र प्रायः उपेक्षित छोड़ देता है।
देश में CPAA (Cancer Patients Aid Association), CanSupport, V Care Foundation, Indian Cancer Society, Tata Memorial Centre की कल्याण शाखा जैसी संस्थाएँ दशकों से कार्यरत हैं।
३.२ NGOs की आर्थिक संरचना और कमजोरियाँ
अधिकांश कैंसर NGOs की वित्त व्यवस्था तीन मुख्य स्रोतों पर टिकी है:
१. CSR अनुदान (Corporate Social Responsibility)
२. व्यक्तिगत दान (Individual donations/crowdfunding)
३. अंतरराष्ट्रीय अनुदान (Foreign foundations)
इनमें से हर एक स्रोत की अपनी संरचनात्मक कमजोरी है।
CSR के बारे में: भारत में कॉर्पोरेट स्वास्थ्य CSR खर्च 2015 के लगभग ₹8,400 करोड़ से बढ़कर 2024 में ₹22,000 करोड़ से अधिक हो गया है, जो गैर-सरकारी स्वास्थ्य वित्तपोषण के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है। (Nitisha Singhvi) यह वृद्धि उत्साहजनक है, लेकिन इसका एक अंधेरा पहलू भी है।
CSR की प्रकृति परियोजना-आधारित और दृश्यता-केंद्रित होती जा रही है। आलोचकों का मानना है कि कॉर्पोरेट डिजिटल हेल्थ CSR कभी-कभी उन परियोजनाओं को प्राथमिकता देता है जो अधिक दिखाई देती हैं, बजाय उन जरूरी लेकिन अनाकर्षक कार्यों के जैसे कि मौजूदा स्वास्थ्य IT प्रणालियों को बनाए रखना या कर्मचारियों को डिजिटल उपकरणों का उपयोग सिखाना।
भाग ४: जब CSR और अन्य स्रोत सूखते हैं - NGOs की बदहाली
यह इस लेख का सबसे महत्वपूर्ण और प्रायः अनकहा अध्याय है।
४.१ संकट के कारण -
कारण १ —
CSR की चंचल प्रकृति: कंपनियाँ अपने CSR फोकस क्षेत्र बदलती रहती हैं। आज कैंसर, कल शिक्षा, परसों जलवायु। जो NGO एकाधिक वर्षों से एक कॉर्पोरेट पर निर्भर है, उसके लिए एकाएक CSR पार्टनरशिप समाप्त होना एक बड़ा झटका होता है।
कारण २ —
आर्थिक मंदी का प्रभाव: मंदी के दौर में कंपनियों के मुनाफे घटते हैं, और Companies Act 2013 के अनुसार CSR दायित्व नेट मुनाफे से जुड़ा है। मुनाफा घटा, तो CSR बजट अपने आप सिकुड़ा।
कारण ३ —
FCRA कानून की मार: भारत में विदेशी अनुदान पाने वाली NGOs को Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) के तहत पंजीकरण आवश्यक है। 2020 के बाद से FCRA नियम बेहद कड़े हो गए हैं। हजारों NGOs के FCRA लाइसेंस रद्द हो चुके हैं। इससे कैंसर सहित स्वास्थ्य क्षेत्र की NGOs को अंतरराष्ट्रीय फंडिंग से हाथ धोना पड़ा।
कारण ४ —
कोविड का दीर्घकालिक असर: कोविड के दौरान दानदाताओं का ध्यान तत्काल राहत की ओर मुड़ा। कैंसर NGOs को चंदा मिलना लगभग बंद हो गया। कई संस्थाओं को कार्यक्रम बंद करने पड़े। और जब कोविड के बाद पुनः शुरुआत हुई, तो पुराने दानदाताओं ने नई प्राथमिकताएँ बना ली थीं।
कारण ५ —
वैश्विक सहायता में गिरावट: बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता और घटते अंतरराष्ट्रीय सहयोग के इस दौर में दुनियाभर की सरकारों ने अंतरराष्ट्रीय विकास सहायता काफी कम कर दी है।
४.२ बदहाली के व्यावहारिक परिणाम
जब फंड सूखता है, तो पहले क्या बंद होता है?
पहले जाती हैं — outreach सेवाएँ: जागरूकता शिविर, गाँव-गाँव जाने वाले स्वास्थ्य कर्मचारी।
फिर रुकता है — मरीज आवास और यात्रा सहायता: जिन गरीब मरीजों को शहरी अस्पताल में इलाज के दौरान ठहरने की जगह मिलती थी, वे बेघर हो जाते हैं।
फिर कट जाती हैं — दवाएँ और उपशामक देखभाल।
अंत में बंद होती है — संस्था स्वयं।
यह कोई काल्पनिक परिदृश्य नहीं है। भारत में अनेक छोटी और मध्यम आकार की कैंसर NGOs इसी चक्र में नष्ट हो चुकी हैं।
४.३ संरचनात्मक समस्या: परजीविता का जाल
अधिकांश कैंसर NGOs की व्यवसाय पद्धति (business model) मूलतः दोषपूर्ण है — वे बाहरी दान पर 80-100% निर्भर हैं। इसका अर्थ है कि वे सेवाप्रदाता कम और भिखारी अधिक हो जाती हैं। यह एक ऐसी संरचना है जो दीर्घकालिक स्थिरता की दृष्टि से अत्यंत खतरनाक है।
भाग ५: उपाय योजनाएँ — एक व्यावहारिक दृष्टिकोण
५.१ स्व-वित्तपोषण मॉडल की ओर संक्रमण
सबसे बड़ा उपाय यह है कि कैंसर-केंद्रित संस्थाएँ चंदे और CSR पर निर्भरता घटाकर स्व-अर्जित राजस्व की ओर बढ़ें। इसके कुछ मॉडल:
हाइब्रिड मॉडल: जहाँ कृषि, प्रसंस्करण उद्योग, या तकनीकी सेवाओं से कमाई का एक हिस्सा सीधे कैंसर-सेवा को पोषित करे। एक CCCRREE केंद्र यदि अपनी भूमि पर औषधीय खेती, प्रसंस्करण इकाई और स्वास्थ्य पर्यटन चलाए, तो वह स्वयं अपने खर्चे उठाने में समर्थ हो सकता है।
PPP (Public-Private Partnership): सरकार बुनियादी ढाँचा दे, निजी संस्था संचालन करे, और मुनाफे का एक निश्चित प्रतिशत गरीब मरीजों की सेवा में वापस जाए।
५.२ सरकारी स्तर पर आवश्यक सुधार
एक —
समर्पित बजट लाइन: कैंसर को अन्य NCDs से अलग करके उसके लिए स्वतंत्र बजट निर्धारित हो, न कि NPCDCS की साझा थैली में से।
दो —
जिला-स्तरीय ऑन्कोलॉजी: हर जिला अस्पताल में एक प्रशिक्षित ऑन्कोलॉजिस्ट और एक रेडियोथेरेपी यूनिट का लक्ष्य।
तीन —
HMCPF की सीमा वृद्धि: ₹15 लाख की सीमा आज के उपचार खर्चों के मुकाबले बेहद अपर्याप्त है। इसे ₹30-50 लाख किया जाए।
चार —
राज्यों को समय पर निधि: राज्यों से जिलों तक फंड वितरण में देरी एक चिरंतन समस्या है (PubMed Central) — इसके लिए डिजिटल ट्रैकिंग और दंड-प्रोत्साहन प्रणाली लागू हो।
५.३ CSR को अधिक प्रभावशाली बनाने के उपाय
सबसे प्रभावशाली CSR वह है जो कॉर्पोरेट संसाधनों को सरकारी बुनियादी ढाँचे और NGO की कार्यान्वयन दक्षता के साथ जोड़ता है। (Nitisha Singhvi)
इस दिशा में:
बहु-वर्षीय प्रतिबद्धता: CSR अनुबंध कम से कम 3-5 वर्ष के हों।
प्रभाव-आधारित भुगतान (Outcome-based contracts): धन तभी मिले जब लक्ष्य प्राप्त हों।
कैंसर-विशेष CSR कंसोर्टियम: कई कंपनियाँ मिलकर एक कैंसर केंद्र को दीर्घकालिक रूप से पोषित करें।
५.४ नवीन वैश्विक वित्त मॉडल
2025 में UN General Assembly के दौरान "Global Cancer Financing Platform" की घोषणा हुई, जो नवोन्मेषी वित्तपोषण मॉडलों की खोज में जुटी है। (The Lancet) इनमें से कुछ विचार भारत के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं:
डायस्पोरा फंडिंग: विदेश में बसे भारतीयों से कैंसर-विशेष फंड में योगदान का आग्रह।
ग्रीन बॉन्ड की तर्ज पर "Health Bonds": दीर्घकालिक स्वास्थ्य परियोजनाओं के लिए पूँजी बाजार से धन।
Technology Philanthropy: IT कंपनियाँ AI-आधारित कैंसर जाँच प्रणालियाँ दान में दें।
५.५ आत्मनिर्भर इकोसिस्टम का निर्माण
सबसे मूलभूत और दीर्घकालिक समाधान यही है कि कैंसर-सेवा केंद्रों को एक स्वयंपोषी पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित किया जाए — जहाँ:
कृषि और प्रसंस्करण से राजस्व आए
प्रशिक्षण और शिक्षा से राजस्व आए
वेलनेस पर्यटन से राजस्व आए
सशुल्क और निःशुल्क सेवाओं का संतुलित अनुपात हो
सरकारी योजनाएँ (PMJAY आदि) से रिम्बर्समेंट आए
CSR पूरक हो, केंद्रीय नहीं
यह मॉडल न केवल आर्थिक दृष्टि से टिकाऊ है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी न्यायसंगत है।
संकट एक अवसर भी है -
कैंसर निर्मूलन की राह में सबसे बड़ी बाधा धन की कमी नहीं है — बाधा है आर्थिक ढाँचे की खामी।
जब तक संस्थाएँ दान-आधारित जीवन जीती रहेंगी, वे कभी पूर्ण क्षमता से काम नहीं कर पाएंगी।
वैश्विक और भारतीय दोनों संदर्भों में यह स्पष्ट है कि:
— सरकारी योजनाएँ जरूरी हैं, पर्याप्त नहीं।
— NGOs अपरिहार्य हैं, पर स्थायी नहीं।
— CSR सहायक है, आधार नहीं।
आधार केवल वह मॉडल बन सकता है जो उत्पादन करे, सेवा दे, और अपने पाँव पर खड़ा हो। जो संस्था रोगी की सेवा के साथ-साथ रोजगार, कृषि, शिक्षा और तकनीक को एक सूत्र में पिरो सके — वही कैंसर के विरुद्ध इस दीर्घकालिक युद्ध में टिकेगी।
अन्यथा हर बार CSR का नल बंद होते ही, कोई कैंसर-ग्रस्त माँ अपनी दवा के लिए तरसती रहेगी — और हम केवल रिपोर्टें और संकल्प-पत्र तैयार करते रहेंगे।
(यह लेख OMDRAAM Foundation के शोध एवं नीति-विमर्श कार्य के संदर्भ में लिखा गया है।)
आपके सुझाव आमंत्रित हैं 🙏
सादर,
Narendra Patil
OMDRAAM IMWWC 3CATS SYNERGIES
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