01/01/2026
भोपाल में प्रदेश के जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर राज्य स्तर का जन परामर्श
मध्यप्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना पर राज्य स्तरीय जन परामर्श 28–29 दिसंबर को आईकफ आश्रम, भोपाल में संपन्न हुआ। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में प्रदेश के विभिन्न जिलों सतना, रीवा, मंडला, सिवनी, जबलपुर, सीधी, डिंडोरी, खरगोन, इंदौर, खंडवा, हरदा, सीहोर, बैतूल, रायसेन और भोपाल से लगभग 50 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
संवाद में दलित, आदिवासी, घुमंतु समुदाय, किसान संगठन, मछुआरे, कुम्हार, पशुपालक, असंगठित मजदूर, घरेलू कामगार, निर्माण श्रमिक, महिला समूह, युवा, बीज बैंक, दिव्यांग संगठन, एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता, पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ सहित विविध समुदायों और संस्थाओं ने अपनी भागीदारी दर्ज की।
नागरिक समाज संस्थाओं और प्रमुख संगठनों में भू अधिकार अभियान, बरगी मत्स्य संघ, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ, नागरिक अधिकार मंच, मंजल, रेवांचल दलित आदिवासी सेवा संस्थान, मध्यप्रदेश विज्ञान सभा, किसान जागृति संगठन, रोको टोको ठोको क्रांतिकारी मोर्चा, प्रगति दिव्यांग सेवा समिति और सर्व आदिवासी समाज कल्याण संगठन शामिल रहे।
इस जन परामर्श का आयोजन उन्नति इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट, भोपाल द्वारा किया गया। कार्यक्रम के उद्देश्य पर आधार वक्तव्य देते हुए उन्नति संस्था, भोपाल से राजेश कुमार ने योजना का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर जलवायु संकट की स्थानीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक सुदृढ़ कार्ययोजना का होना अत्यंत आवश्यक है। ऐसी कार्ययोजना तभी प्रभावी होगी जब सभी वंचित समुदायों और समूहों के साथ प्रत्येक स्तर पर संवाद सुनिश्चित किया जाए। किंतु, मध्यप्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना के निर्माण की प्रक्रिया में बहु-स्तरीय समुदाय और हितधारक संवाद को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया।
राजेश कुमार ने आगे कहा कि योजना के बजटीय आवंटन में स्पष्ट असमानताएँ दिखाई देती हैं, जो इसकी व्यवहार्यता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। जलवायु कार्रवाई हेतु राज्य का बजटीय आवंटन भी अस्पष्ट है, जिससे हाशिये पर स्थित क्षेत्रों के लिए संसाधन आवंटन अनिश्चित प्रतीत होता है। साथ ही, योजना में वित्तीय स्रोतों की स्थिरता को लेकर गंभीर प्रश्न उठते हैं। अंतर्राष्ट्रीय निधियों (जैसे ग्रीन क्लाइमेट फंड) और केंद्रीय योजनाओं पर अत्यधिक निर्भरता स्थायित्व की चुनौती प्रस्तुत करती है। विशेष रूप से संवेदनशील जिलों—जैसे सिंगरौली और झाबुआ—को कोई लक्षित वित्तीय प्रतिबद्धता नहीं दी गई है, जबकि इन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी।
इस दो दिवसीय जन परामर्श में जलवायु परिवर्तन से जुड़े आठ विभिन्न विषयों पर पैनल चर्चाएँ आयोजित की गईं और सुझाव प्रस्तुत किए गए। प्रथम सत्र भारत और मध्यप्रदेश में बढ़ता जलवायु संकट विषय पर केंद्रित था। वरिष्ठ पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी. पांडे ने कहा कि संसाधनों के अतिदोहन और पूंजीवादी व्यवस्था के कारण विकास की अंधाधुंध दौड़ ने न केवल राज्य, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोगों को जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है।
उन्होंने आगे बताया कि भोपाल और उसके आसपास प्रतिदिन लगभग पाँच हजार पेड़ों की कटाई हो रही है, जिससे वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है और क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। डॉ. पांडे ने चेतावनी दी कि जब तक जलवायु परिवर्तन पर एक मजबूत और समावेशी कार्ययोजना नहीं बनाई जाती, प्रदेश में संकट और गहराता जाएगा।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए रोको टोको ठोको क्रांतिकारी मोर्चा, सीधी के उमेश तिवारी ने कहा कि जलवायु संकट की नीतियों के निर्माण में वंचित समुदायों की उपेक्षा कर समस्या का समाधान संभव नहीं है। उनके मुद्दों को संबोधित करना अनिवार्य है।
दूसरे सत्र राज्य में जलवायु परिवर्तन, कृषि संकट और खाद्य सुरक्षा पर केंद्रित था। किसान जागृति संगठन के प्रमुख इरफान जाफरी और मध्यप्रदेश विज्ञान सभा के महासचिव एवं कृषि विशेषज्ञ सुभाष शर्मा ने संयुक्त रूप से कहा कि बाजारवाद के प्रभाव से किसान और कृषि दोनों ही गहरे संकट का सामना कर रहे हैं। रसायनों के अत्यधिक उपयोग ने किसानों को कर्ज के बोझ तले दबा दिया है और पारंपरिक कृषि पद्धतियों तथा बीजों को नष्ट कर दिया है। परिणामस्वरूप, एक ओर किसान खेती छोड़ रहे हैं और दूसरी ओर कृषि पूरी तरह बाजार पर निर्भर होती जा रही है।
उन्होंने आगे बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण कहीं सूखा पड़ रहा है तो कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है, जिससे कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आ रही है। जो उत्पादन हो भी रहा है, उसका बाजार मूल्य लागत से कम मिल रहा है। इस स्थिति से निपटने के लिए एक ठोस जलवायु कार्ययोजना का निर्माण आवश्यक है, जिसमें किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. अश्विनी जाधव ने कहा कि राज्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लोगों के लिए सुरक्षित और पोषणयुक्त भोजन की उपलब्धता, पहुँच और सुलभता की गारंटी देता है। इसका सीधा प्रभाव सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक समानता पर पड़ता है।
मध्यप्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना पर आयोजित इस जन परामर्श में शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले विभिन्न कौशल और सेवाओं से जुड़े समुदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उन्होंने साझा किया कि जलवायु परिवर्तन उनके जीवनयापन और रोजगार के साधनों पर किस प्रकार प्रभाव डाल रहा है।
बरगी मत्स्य संघ, जबलपुर से आए मुन्ना बर्मन ने बताया कि मौसम में हो रहे बदलाव के कारण न केवल मछलियों की मात्रा प्रभावित हो रही है, बल्कि उनकी गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप मछुआरों को बाजार में अपेक्षाकृत कम मूल्य प्राप्त हो रहा है।
मोगली पलटन समूह, सीधी ने बताया कि जलवायु परिवर्तन और सोन नदी में पानी की कमी के कारण घड़ियाल संरक्षण पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है। घुमंतु समुदाय से आई रूपरानी दीदी ने साझा किया कि उनका समुदाय पूरी तरह प्रकृति और जंगल पर निर्भर था, किंतु जैसे-जैसे जंगल नष्ट होते गए, उन्हें मजबूरन शहरों की ओर पलायन करना पड़ा, जहाँ आजीविका के अभाव में उन्हें कूड़ा बीनने का कार्य करना पड़ रहा है।
कुम्हार समुदाय से आए जितेन्द्र ने कहा कि मशीनीकरण और संसाधनों की कमी के चलते यह समुदाय धीरे-धीरे अपने पारंपरिक कार्यों से दूर होता जा रहा है और अन्य आजीविकाओं की ओर बढ़ रहा है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से पानी और मिट्टी की अनिश्चितता ने उनकी पारंपरिक आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक लोग रोजगार विहीन हो गए हैं। ये सभी समुदाय सीधे जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं और हाशिये पर खड़े समूह हैं। दुर्भाग्यवश, इनके मुद्दों को राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना की रणनीति में स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं किया गया है।
एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता अब्दूल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जिस प्रकार आम महिला और पुरुषों के रोजगार एवं जीवन पर पड़ रहा है, उसी प्रकार यह एलजीबीटीक्यू समुदाय को भी प्रभावित कर रहा है। अन्य विशेषज्ञों ने भी अपने विचार रखते हुए जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना समावेशी होनी चाहिए, ताकि सभी जेंडर समूहों की आवश्यकताओं और मुद्दों को समुचित रूप से संबोधित किया जा सके।
प्रगति दिव्यांग सेवा समिति, खंडवा से आए अखिलेश ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण कई प्रकार की विकलांगताओं से जुड़ी बीमारियाँ मौसम में बदलाव के साथ और अधिक गंभीर हो जाती हैं। तेज धूप या भारी वर्षा जैसी परिस्थितियों में दिव्यांगजन सामान्य व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक कठिनाइयों का सामना करते हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना में विकलांगता से संबंधित मुद्दों को भी समुचित रूप से शामिल किया जाना आवश्यक है।
बरंगी बाधं विस्थापित और प्रभावित संघ से राजकुमार सिन्हा ने अपने वीडियो संदेश के माध्यम से बिजली क्षेत्र पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि योजना में जिन आँकड़ों का उपयोग किया गया है, वे अत्यंत पुराने हैं, जिसके कारण यह कार्ययोजना कमजोर प्रतीत होती है। उन्होंने उल्लेख किया कि एक ओर हम जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के उपाय खोज रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नए कोयला-आधारित संयंत्रों और बाँधों के निर्माण की योजना बनाई जा रही है। इन परियोजनाओं के कारण हजारों एकड़ जंगलों की कटाई और डूब क्षेत्र का विस्तार होगा। जबकि मध्यप्रदेश में वर्तमान में स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता राज्य की मांग से कहीं अधिक है।
भू अधिकार अभियान, जबलपुर से आए राहुल श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में कहा कि राज्य की जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम, 1996 को रेखांकित नहीं करती है, जबकि ये दोनों अधिनियम आदिवासी समुदायों के वन संसाधनों पर अधिकारों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि आदिवासी समुदाय अपनी आजीविका के लिए वनों पर गहराई से निर्भर हैं, और यदि उनके अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित नहीं किया गया तो उनके उल्लंघन का गंभीर जोखिम उत्पन्न होगा।
उन्होंने यह भी चेताया कि बड़ी विकास परियोजनाओं में आदिवासी समुदाय की सहमति सुनिश्चित न होने से सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और बढ़ सकती हैं। इसी क्रम में अन्य संस्थाओं और संगठनों से आए प्रतिनिधियों ने भी अपने मुद्दे और सुझाव प्रस्तुत किए। अंततः निर्णय लिया गया कि इन सुझावों को संकलित कर एक मांग पत्र तैयार किया जाए और राज्य सरकार की जलवायु परिवर्तन संबंधी नोडल एजेंसी को सौंपा जाए।