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World Labour Day..... Jindabaad
01/05/2026

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World Earth Day 2026
22/04/2026

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शिक्षित हो, संघर्ष करो और संगठित रहो...जय भीम
14/04/2026

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Growing crisis of water and forest in Madhya Pradesh
22/03/2026

Growing crisis of water and forest in Madhya Pradesh

World Water DaySignificant water challenges persist in India, where 70% of water resources are contaminated. As a conseq...
22/03/2026

World Water Day
Significant water challenges persist in India, where 70% of water resources are contaminated. As a consequence, about 45% of the population experiences water shortages, particularly in summer. Moreover, the per capita water consumption has decreased from 1545 cubic meters per person annually in 2011 to 1486 cubic meters in 2021, and further reductions are anticipated. Hence, the protection of rivers and revival of ancient water bodies are critical initiatives.


22/02/2026

मध्यप्रदेश 𝟐𝟎𝟐𝟔–𝟐𝟕 का बजट: ग्रीन फ्रेमवर्क का दावा और जलवायु संकट

मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने राज्य विधानसभा में 2026–27 का ₹4,38,317 करोड़ का बजट पेश किया। इसे राज्य का पहला ग्रीन बजट ढांचा बताया गया, लेकिन वास्तविक आवंटन में जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर कमियाँ दिखाई देती हैं।

पर्यावरण संरक्षण के लिए मात्र ₹31 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष के ₹39 करोड़ से लगभग 20 प्रतिशत कम है। वहीं वन संरक्षण हेतु ₹6,121 करोड़ का बजट रखा गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि सरकार वन संरक्षण को प्राथमिकता दे रही है, लेकिन व्यापक पर्यावरणीय और जलवायु संकट को नजरअंदाज कर रही है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि बजट में जलवायु परिवर्तन के लिए कोई स्पष्ट बजट लाइन नहीं दी गई है। न तो अनुकूलन (Adaptation) और न ही शमन (Mitigation) कार्यक्रमों के लिए अलग प्रावधान किया गया है। कुल बजट का मात्र 0.007 प्रतिशत पर्यावरण संरक्षण पर खर्च किया जा रहा है, जो नगण्य है।

यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब प्रदेश में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसम की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2022 से 2025 तक मध्यप्रदेश ने 598 दिनों में गंभीर मौसम का सामना किया, यानी लगभग हर तीसरे दिन। इस दौरान 1,439 लोगों की मौत हुई, 82,170 हेक्टेयर फसलें बर्बाद हुईं, 20,000 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हुए और 6,000 पशुओं की मृत्यु हुई। वर्ष 2024 में ही प्रदेश ने 176 चरम मौसम वाले दिन दर्ज किए, जिनमें 353 लोगों की मौत हुई और 25,170 हेक्टेयर प्रभावित हुए।
अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश की स्थिति और भी कमजोर दिखती है। राजस्थान ने अपने पहले ग्रीन बजट 2025–26 में कुल निधियों का 11.34 प्रतिशत सतत विकास और जलवायु परिवर्तन के लिए आवंटित किया। गुजरात ने जलवायु परियोजनाओं के लिए ₹165 करोड़ का प्रावधान किया। इसके विपरीत मध्यप्रदेश ने पर्यावरण बजट घटा दिया और जलवायु परिवर्तन का कोई उल्लेख नहीं किया।

राज्य ने हाल ही में मध्यप्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना 2023–28 तैयार की है, जिसमें ₹97,000 करोड़ का बजट प्रस्तावित है। लेकिन पर्यावरण विभाग का बजट मात्र ₹31 करोड़ है। यह गंभीर असमानता दर्शाती है कि कार्ययोजना के वित्तपोषण को लेकर स्पष्टता नहीं है। संभावित धन स्रोतों—केंद्रीय योजनाएँ, अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त, निजी निवेश—का उल्लेख अस्पष्ट है। इस अनिश्चितता के कारण कार्यान्वयन बाधित होता है।
बजट में आपदा राहत के लिए ₹715 करोड़ और राज्य आपदा निधि हेतु ₹564 करोड़ का प्रावधान किया गया है, लेकिन इनमें भी जलवायु दृष्टिकोण का समन्वय नहीं दिखता।

यह स्पष्ट है कि सरकार जलवायु संकट की गंभीरता को प्राथमिकता नहीं दे रही है। जब पूरी दुनिया जलवायु संकट से निपटने के लिए निवेश बढ़ा रही है, तब मध्यप्रदेश सरकार बिना जलवायु परिवर्तन का नाम लिए बजट पारित कर रही है। इसका सबसे बड़ा असर हाशिए पर खड़े समुदायों—दलित, आदिवासी, किसान, मछुआरे, महिला समूह, दिव्यांग और एलजीबीटीक्यू समुदाय पर पड़ रहा है, जो सीधे जलवायु आपदाओं से प्रभावित हो रहे हैं और जिनके पास संसाधनों की भारी कमी है।

मध्यप्रदेश का 2026–27 बजट ग्रीन बजट कहलाने के बावजूद जलवायु संकट से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति प्रस्तुत नहीं करता। यह न केवल सरकार की गंभीरता की कमी को दर्शाता है बल्कि भविष्य में बढ़ते जलवायु संकट से निपटने की क्षमता को भी कमजोर करता है। सरकार को चाहिए कि वह एक स्पष्ट बजट लाइन, समर्पित वित्तीय रणनीति और विभागीय समन्वय सुनिश्चित करे, ताकि जलवायु कार्ययोजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके और कमजोर समुदायों को सुरक्षा प्रदान की जा सके।

भीषण गर्मी. प्रजातियों का विलुप्त होना. प्रदूषण से भरा दमघोंटू आसमान.UN Environment Programme की नई रिपोर्ट के अनुसार, अ...
13/01/2026

भीषण गर्मी. प्रजातियों का विलुप्त होना. प्रदूषण से भरा दमघोंटू आसमान.

UN Environment Programme की नई रिपोर्ट के अनुसार, अगर मानवता ने बढ़ते पर्यावरणीय संकटों को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो दुनिया का भविष्य ऐसा ही होगा. यह अब तक का ग्रह का सबसे व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन है, जिसे 82 देशों के 287 विशेषज्ञों ने विकसित किया है.

लेकिन रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है: यह भविष्य अटल नहीं है. जलवायु, प्रकृति, प्रदूषण और संसाधनों के उपयोग पर साहसिक कार्रवाई करके, हम अब भी स्थिति को बदल सकते हैं.

रिपोर्ट के बारे में और जानें-

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पृथ्वी गम्भीर पर्यावरणीय संकट का स....

05/01/2026
भारत में जलवायु संकट अब वैज्ञानिक बहस से आगे बढ़कर रोजमर्रा का अनुभव बन गया है। येल प्रोग्राम के अध्ययन के अनुसार, सर्वे...
04/01/2026

भारत में जलवायु संकट अब वैज्ञानिक बहस से आगे बढ़कर रोजमर्रा का अनुभव बन गया है। येल प्रोग्राम के अध्ययन के अनुसार, सर्वे में शामिल राजस्थान के 80 फीसदी और ओडिशा के 64 फीसदी लोग जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहे हैं।

भारत में जलवायु संकट अब सिर्फ वैज्ञानिक बहस का विषय नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अनुभव बन चुका है। येल प्रोग्राम ऑन क्ल.....

भोपाल में प्रदेश के जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर राज्य स्तर का जन परामर्श                                            म...
01/01/2026

भोपाल में प्रदेश के जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर राज्य स्तर का जन परामर्श
मध्यप्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना पर राज्य स्तरीय जन परामर्श 28–29 दिसंबर को आईकफ आश्रम, भोपाल में संपन्न हुआ। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में प्रदेश के विभिन्न जिलों सतना, रीवा, मंडला, सिवनी, जबलपुर, सीधी, डिंडोरी, खरगोन, इंदौर, खंडवा, हरदा, सीहोर, बैतूल, रायसेन और भोपाल से लगभग 50 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
संवाद में दलित, आदिवासी, घुमंतु समुदाय, किसान संगठन, मछुआरे, कुम्हार, पशुपालक, असंगठित मजदूर, घरेलू कामगार, निर्माण श्रमिक, महिला समूह, युवा, बीज बैंक, दिव्यांग संगठन, एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता, पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ सहित विविध समुदायों और संस्थाओं ने अपनी भागीदारी दर्ज की।

नागरिक समाज संस्थाओं और प्रमुख संगठनों में भू अधिकार अभियान, बरगी मत्स्य संघ, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ, नागरिक अधिकार मंच, मंजल, रेवांचल दलित आदिवासी सेवा संस्थान, मध्यप्रदेश विज्ञान सभा, किसान जागृति संगठन, रोको टोको ठोको क्रांतिकारी मोर्चा, प्रगति दिव्यांग सेवा समिति और सर्व आदिवासी समाज कल्याण संगठन शामिल रहे।

इस जन परामर्श का आयोजन उन्नति इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट, भोपाल द्वारा किया गया। कार्यक्रम के उद्देश्य पर आधार वक्तव्य देते हुए उन्नति संस्था, भोपाल से राजेश कुमार ने योजना का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर जलवायु संकट की स्थानीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक सुदृढ़ कार्ययोजना का होना अत्यंत आवश्यक है। ऐसी कार्ययोजना तभी प्रभावी होगी जब सभी वंचित समुदायों और समूहों के साथ प्रत्येक स्तर पर संवाद सुनिश्चित किया जाए। किंतु, मध्यप्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना के निर्माण की प्रक्रिया में बहु-स्तरीय समुदाय और हितधारक संवाद को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया।

राजेश कुमार ने आगे कहा कि योजना के बजटीय आवंटन में स्पष्ट असमानताएँ दिखाई देती हैं, जो इसकी व्यवहार्यता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। जलवायु कार्रवाई हेतु राज्य का बजटीय आवंटन भी अस्पष्ट है, जिससे हाशिये पर स्थित क्षेत्रों के लिए संसाधन आवंटन अनिश्चित प्रतीत होता है। साथ ही, योजना में वित्तीय स्रोतों की स्थिरता को लेकर गंभीर प्रश्न उठते हैं। अंतर्राष्ट्रीय निधियों (जैसे ग्रीन क्लाइमेट फंड) और केंद्रीय योजनाओं पर अत्यधिक निर्भरता स्थायित्व की चुनौती प्रस्तुत करती है। विशेष रूप से संवेदनशील जिलों—जैसे सिंगरौली और झाबुआ—को कोई लक्षित वित्तीय प्रतिबद्धता नहीं दी गई है, जबकि इन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी।

इस दो दिवसीय जन परामर्श में जलवायु परिवर्तन से जुड़े आठ विभिन्न विषयों पर पैनल चर्चाएँ आयोजित की गईं और सुझाव प्रस्तुत किए गए। प्रथम सत्र भारत और मध्यप्रदेश में बढ़ता जलवायु संकट विषय पर केंद्रित था। वरिष्ठ पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी. पांडे ने कहा कि संसाधनों के अतिदोहन और पूंजीवादी व्यवस्था के कारण विकास की अंधाधुंध दौड़ ने न केवल राज्य, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लोगों को जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है।

उन्होंने आगे बताया कि भोपाल और उसके आसपास प्रतिदिन लगभग पाँच हजार पेड़ों की कटाई हो रही है, जिससे वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है और क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। डॉ. पांडे ने चेतावनी दी कि जब तक जलवायु परिवर्तन पर एक मजबूत और समावेशी कार्ययोजना नहीं बनाई जाती, प्रदेश में संकट और गहराता जाएगा।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए रोको टोको ठोको क्रांतिकारी मोर्चा, सीधी के उमेश तिवारी ने कहा कि जलवायु संकट की नीतियों के निर्माण में वंचित समुदायों की उपेक्षा कर समस्या का समाधान संभव नहीं है। उनके मुद्दों को संबोधित करना अनिवार्य है।

दूसरे सत्र राज्य में जलवायु परिवर्तन, कृषि संकट और खाद्य सुरक्षा पर केंद्रित था। किसान जागृति संगठन के प्रमुख इरफान जाफरी और मध्यप्रदेश विज्ञान सभा के महासचिव एवं कृषि विशेषज्ञ सुभाष शर्मा ने संयुक्त रूप से कहा कि बाजारवाद के प्रभाव से किसान और कृषि दोनों ही गहरे संकट का सामना कर रहे हैं। रसायनों के अत्यधिक उपयोग ने किसानों को कर्ज के बोझ तले दबा दिया है और पारंपरिक कृषि पद्धतियों तथा बीजों को नष्ट कर दिया है। परिणामस्वरूप, एक ओर किसान खेती छोड़ रहे हैं और दूसरी ओर कृषि पूरी तरह बाजार पर निर्भर होती जा रही है।

उन्होंने आगे बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण कहीं सूखा पड़ रहा है तो कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है, जिससे कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आ रही है। जो उत्पादन हो भी रहा है, उसका बाजार मूल्य लागत से कम मिल रहा है। इस स्थिति से निपटने के लिए एक ठोस जलवायु कार्ययोजना का निर्माण आवश्यक है, जिसमें किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. अश्विनी जाधव ने कहा कि राज्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह लोगों के लिए सुरक्षित और पोषणयुक्त भोजन की उपलब्धता, पहुँच और सुलभता की गारंटी देता है। इसका सीधा प्रभाव सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक समानता पर पड़ता है।

मध्यप्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना पर आयोजित इस जन परामर्श में शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले विभिन्न कौशल और सेवाओं से जुड़े समुदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उन्होंने साझा किया कि जलवायु परिवर्तन उनके जीवनयापन और रोजगार के साधनों पर किस प्रकार प्रभाव डाल रहा है।

बरगी मत्स्य संघ, जबलपुर से आए मुन्ना बर्मन ने बताया कि मौसम में हो रहे बदलाव के कारण न केवल मछलियों की मात्रा प्रभावित हो रही है, बल्कि उनकी गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप मछुआरों को बाजार में अपेक्षाकृत कम मूल्य प्राप्त हो रहा है।

मोगली पलटन समूह, सीधी ने बताया कि जलवायु परिवर्तन और सोन नदी में पानी की कमी के कारण घड़ियाल संरक्षण पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है। घुमंतु समुदाय से आई रूपरानी दीदी ने साझा किया कि उनका समुदाय पूरी तरह प्रकृति और जंगल पर निर्भर था, किंतु जैसे-जैसे जंगल नष्ट होते गए, उन्हें मजबूरन शहरों की ओर पलायन करना पड़ा, जहाँ आजीविका के अभाव में उन्हें कूड़ा बीनने का कार्य करना पड़ रहा है।

कुम्हार समुदाय से आए जितेन्द्र ने कहा कि मशीनीकरण और संसाधनों की कमी के चलते यह समुदाय धीरे-धीरे अपने पारंपरिक कार्यों से दूर होता जा रहा है और अन्य आजीविकाओं की ओर बढ़ रहा है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से पानी और मिट्टी की अनिश्चितता ने उनकी पारंपरिक आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक लोग रोजगार विहीन हो गए हैं। ये सभी समुदाय सीधे जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं और हाशिये पर खड़े समूह हैं। दुर्भाग्यवश, इनके मुद्दों को राज्य जलवायु परिवर्तन क्रियान्वयन योजना की रणनीति में स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं किया गया है।

एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता अब्दूल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जिस प्रकार आम महिला और पुरुषों के रोजगार एवं जीवन पर पड़ रहा है, उसी प्रकार यह एलजीबीटीक्यू समुदाय को भी प्रभावित कर रहा है। अन्य विशेषज्ञों ने भी अपने विचार रखते हुए जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना समावेशी होनी चाहिए, ताकि सभी जेंडर समूहों की आवश्यकताओं और मुद्दों को समुचित रूप से संबोधित किया जा सके।

प्रगति दिव्यांग सेवा समिति, खंडवा से आए अखिलेश ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण कई प्रकार की विकलांगताओं से जुड़ी बीमारियाँ मौसम में बदलाव के साथ और अधिक गंभीर हो जाती हैं। तेज धूप या भारी वर्षा जैसी परिस्थितियों में दिव्यांगजन सामान्य व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक कठिनाइयों का सामना करते हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना में विकलांगता से संबंधित मुद्दों को भी समुचित रूप से शामिल किया जाना आवश्यक है।

बरंगी बाधं विस्थापित और प्रभावित संघ से राजकुमार सिन्हा ने अपने वीडियो संदेश के माध्यम से बिजली क्षेत्र पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि योजना में जिन आँकड़ों का उपयोग किया गया है, वे अत्यंत पुराने हैं, जिसके कारण यह कार्ययोजना कमजोर प्रतीत होती है। उन्होंने उल्लेख किया कि एक ओर हम जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के उपाय खोज रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नए कोयला-आधारित संयंत्रों और बाँधों के निर्माण की योजना बनाई जा रही है। इन परियोजनाओं के कारण हजारों एकड़ जंगलों की कटाई और डूब क्षेत्र का विस्तार होगा। जबकि मध्यप्रदेश में वर्तमान में स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता राज्य की मांग से कहीं अधिक है।

भू अधिकार अभियान, जबलपुर से आए राहुल श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में कहा कि राज्य की जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम, 1996 को रेखांकित नहीं करती है, जबकि ये दोनों अधिनियम आदिवासी समुदायों के वन संसाधनों पर अधिकारों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि आदिवासी समुदाय अपनी आजीविका के लिए वनों पर गहराई से निर्भर हैं, और यदि उनके अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित नहीं किया गया तो उनके उल्लंघन का गंभीर जोखिम उत्पन्न होगा।
उन्होंने यह भी चेताया कि बड़ी विकास परियोजनाओं में आदिवासी समुदाय की सहमति सुनिश्चित न होने से सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और बढ़ सकती हैं। इसी क्रम में अन्य संस्थाओं और संगठनों से आए प्रतिनिधियों ने भी अपने मुद्दे और सुझाव प्रस्तुत किए। अंततः निर्णय लिया गया कि इन सुझावों को संकलित कर एक मांग पत्र तैयार किया जाए और राज्य सरकार की जलवायु परिवर्तन संबंधी नोडल एजेंसी को सौंपा जाए।

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