09/09/2025
आज 9 सितंबर को हिमालय दिवश है, इस बार हिमालय और हिमालयी लोगों ने जो त्रासदी देखी है और जितनी बड़ी संख्या में जनहानि हुई है इस अवसर पर बधाई भी नहीं दी जा सकती। उत्तराखंड राज्य बने ढाई दशक हो चुका है, हिमालयी राज्य होने के बावजूद आज तक हम हिमालय के लिए एक नीति नहीं बना सके। केदारनाथ त्रासदी के बाद सरकार ने तय किया कि प्रत्येक वर्ष 9 सितंबर को हिमालय दिवश मनाया जायेगा। इस निर्णय से लगा कि सरकार हिमालय पर संवेदनशील हो गई है इसलिए अब शायद केदारनाथ जैसी आपदा से तो कम से कम पहाड़ को सामना नहीं करना पड़ेगा।
आज हिमालय दिवश मात्र कागजों में है नीति और नीयत से कोसों दूर। 2014 में मात्र कुछ लोगों के पास जेसीबी मशीन होती थीं और थोड़ा बहुत खनन का कार्य होता था लेकिन आज राज्य में विधायकों, सांसदों से लेकर छुटभैय्ए नेताओं तक सबके पास जेसीबी मशीन हैं और लगभग सभी विधायकों के क्रेशर चल रहे हैं। राज्य में परिवहन विभाग ने जेसीबी मशीन पंजीकरण का आंकड़ा जारी नहीं किया है जबकि इनकी संख्या सत्तर हजार से भी अधिक है और पचास हजार से ज्यादा डंपर जो मात्र खनन के लिए काम आते हैं पंजीकृत हैं। इतनी बड़ी संख्या में जेसीबी मशीन और डंपर जब पहाड़ में होंगे तो उन्हें काम तो हिमालय को खोदने, ढहाने और तोड़ने फोड़ने से ही मिलेगा और ऊपर से ये सभी संसाधन शासन प्रशासन में बैठे लोगों के पास होंगे तो नियम कानून कौन देखने मानने वाला है।हिमालय के अनियमित और अनियंत्रित दोहन का ही परिणाम है कि हमें धराली, थराली और न जाने कितनी भयावह घटनाओं से दो चार होना पड़ रहा है। हिमालय नीति आज समय की मांग है इस पर सरकार और समाज दोनों को चिंतन करना ही होगा।