09/01/2026
शिष्य - गुरुदेव, मैं साधना करता हूँ, पर भीतर उथल-पुथल है। कभी वैराग्य, कभी वासना। कभी शांति,
कभी प्रचंड विक्षोभ। क्या यही मेरी असफलता है?
गुरुदेव- नही, यही प्रकृति है। और जो इससे भयभीत होता है, वह साधक नही भोगी है। प्रकृति का धर्म है
उछाल देना, हिलाना, तोड़ना।
जो हिल गया, वह उसका था।
जो अडिग रहा वही शिव है।
शिष्य- तो यह सब चल क्यों रहा है, गुरुदेव?
गुरु- क्योंकि शक्ति नृत्य करना चाहती है।
उसे रचना चाहिए, भोग चाहिए, अनुभव चाहिए।
जन्म और मृत्यु उसी के खेल हैं।
पर जो खेल को देख रहा है वह खेल में नहीं है।
शिष्य- आप कहते है आप साक्षी हैं।
पर साक्षी भी तो कुछ करता है?
गुरु - नही, साक्षी होता है, करता नहीं।
करना बंधन है। होना मुक्ति है।
मैं न निर्माण करता हूँ, न संहार।
निर्माण भी उसी का है, संहार भी उसी का।
मैं केवल उसके उन्माद को सीमा देता हूँ।
शिष्य- और जब शक्ति उग्र हो जाती है?
गुरु- तब अघोर प्रकट होता है। उग्र को उग्रता से नही
स्थिरता से बांधा जाता है। मैं दया नहीं करता,
मैं न्याय भी नहीं करता। मैं केवल संतुलन हूँ।
शिष्य- तो गुरुदेव, आपका उद्देश्य क्या है?
गुरु (हँसते हुए)- उद्देश्य? उद्देश्य तो प्रकृति का रोग है।
मैं निष्काम हूँ। मुझे कुछ पाना नहीं।
जो पाने की इच्छा करता है वह अभी शक्ति में है।
शिव में आने के लिए सब कुछ खोना पड़ता है
यहाँ तक कि खोने वाला भी।
शिष्य- और आपको कौन देखता है?
गुरु - जिसे कोई देख सके वह सीमित है।
मैं सीमा से पहले हूँ। इसलिए मेरा कोई साक्षी नहीं।
मैं स्वयं ही अंतिम बिंदु हूँ।
शिष्य (कंपित स्वर में)- यह सब किसके लिए है?
गुरु- शक्ति के लिए। उसके अनुभव के लिए।
उसके थकने के लिए। और जिस दिन
वह इस रूप-परिवर्तन से, इस जन्म-मरण से
थक जाएगी। उस दिन वह रोएगी नहीं,
माँगेगी नही सीधे मेरे भीतर गिर पड़ेगी।
शिष्य- और तब?
गुरु - तब न अघोर रहेगा, न शक्ति। न साधना,
न साधक। तब मैं उसे अपने में
पूर्णतः समाहित कर लूँगा।
वह विलय नहीं होगा वह स्मरण होगा।
शिष्य (भूमि पर नतमस्तक)
गुरुदेव, आज जान गया डर शक्ति का था,
शांति शिव की है।
गुरुदेव- जब डर भी मिट जाएगा, तब न शिव बचेगा,
न शक्ति। तब जो रहेगा। वही तुम हो।