Divine life mantra

Divine life mantra समाज सेवा एव अध्यात्म शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार,

.                     ॥जो देता है,वही देवता है॥                 जो देता है वही देवता है।कोई मनुष्य जब समाज को देता है तो...
13/06/2024

. ॥जो देता है,वही देवता है॥

जो देता है वही देवता है।कोई मनुष्य जब समाज को देता है तो देवता के रूप में स्व प्रतिष्ठित भी हो जाता है। प्रभु कृपा करते हैं तो किसी - किसी जीव के मन में सेवा का भाव जगाकर समाज सेवा का निमित्त बनाते हैं।

जिस मनुष्य के जीवन में सेवा और त्याग है, वही मनुष्य समाज में मूल्यवान भी है। सेवा और त्याग का गुण ही समाज में किसी मनुष्य के मूल्य अथवा उपयोगिता का निर्धारण करता है। सेवा और त्याग दैवीय गुण अवश्य हैं मगर सेवा और त्याग का अभिमान ही जीवन का सबसे बड़ा रोग भी है।

मानव हों अथवा देवराज इंद्र, कर्तापन का अभिमान जिसके भी भीतर आता है प्रभु द्वारा उसके अभिमान भाव को एक दिन चूर - चूर अवश्य कर दिया जाता है। सेवा और त्याग के साथ-साथ विनम्रता का भाव ही जीवन की सबसे बड़ी निरोगता है। अतः स्वस्थ जीवन जीने के लिए विनम्र होकर जीना भी अनिवार्य हो जाता है
जय महादेव
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13/05/2024
कथा एक मंदिर की -ग्राम नवादा बिलसंडी तहसील फरीदपुर जिला बरेली में स्थित एक मंदिर जो कि अधूरा बना था और करीब 25-30 वर्ष त...
17/07/2023

कथा एक मंदिर की -
ग्राम नवादा बिलसंडी तहसील फरीदपुर जिला बरेली में स्थित एक मंदिर जो कि अधूरा बना था और करीब 25-30 वर्ष तक ऐसे ही पड़ा रहा किसी ने उसकी देखभाल नहीं की। किसी ने विचार नहीं किया कि इस मंदिर को पूर्ण होना चाहिए। गांव के ही एक संत बाबा नारायण दास जी ने इस मंदिर की आधारशिला रखी थी। जिसका भूमि दान पूर्व प्रधान राजेश्वर सिंह यादव उर्फ लल्ला ने किया था ।कुछ कारणों से मंदिर पूर्ण नहीं हो पाया और अधूरी अवस्था में ही 25- 30 वर्ष तक पड़ा रहा। चारों तरफ झाड़ियां हो गई थी धीरे-धीरे मंदिर गिर रहा था उसकी ईंटे अपनी पकड़ को छोड़ रही थी जब मेरा वहां पहुंचना हुआ मैंने देखा कि यह मंदिर अगर कुछ समय में इसका पुनः जीर्णोद्धार नहीं हुआ तो यह गिर जाएगा समाप्त हो जाएगा जब यह विचार मेरे मन में आया तो मैंने ग्राम वासियों से सलाह मशविरा किया और उसके बाद उस मंदिर को पुनः निर्माण की बात रखी जिस पर भाई विष्णु यादव, भाई राकेश यादव, भाई राय सिंह यादव, भाई ब्रह्मचारी यादव, भाई रामेश्वर यादव ,भाई होशियार सिंह, भाई प्रमोद यादव, चाचा जी नन्हे सिंह यादव, चाचा जी जगदीश यादव जी आदि लोगों ने बड़े मनोयोग से इस कार्य को अपने जिम्मे लिया और मेरे दिशानिर्देश में इस मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ सारी कार्य योजना सारा आय-व्यय का विवरण और जो भी पैसा चंदे में संग्रहित होता था उस सबकी जिम्मेदारी मुझे दी गई ।इस जिम्मेदारी को मैंने भी बड़े मनोयोग से और प्राणपण से और इसको एक लक्ष्य मानकर के कि यही मेरे जीवन का लक्ष्य है कि कैसे भी करके इस मंदिर का निर्माण पूर्ण हो जाए और इसमें भगवान की मूर्ति स्थापना हो जाए इस को लेकर कि हमने बहुत संघर्ष किया शुरुआत में हमें विरोध का सामना करना पड़ा और अपेक्षित सहयोग जो हम चाह रहे थे वह भी नहीं मिल पाया जिस कारण कि इस मंदिर का निर्माण हम एक बार में नहीं करा सके जितना पैसा हम लोगों को मिलता था थोड़ा-थोड़ा करके जो भी मिल जाता तो उस पैसे को हम इस मंदिर में लगा देते थे और हम सब लोग जो कमेटी के मेंबर थे पैसा कम पड़ने पर सभी लोग फिर से आपस में ही चंदा करके इस मंदिर के निर्माण कार्य को पूर्ण कराते थे यह मान करके कि यह गांव का काम नहीं यह हमारा काम है और इसे हमें पूरा कराना है गांव का सहयोग तो है ही लेकिन जो भी कमी रह जाती थी उसे हम सब लोग अपने सामर्थ्य से चंदा करके पूर्ण कराते थे। इस मंदिर की एक दीवार भी गिर गई थी जिसे कि हम लोगों ने पूर्ण कराया अगर वह दीवार दोबारा नहीं बनती तो पूरा कमरा ही गिर सकता था और जिससे कि आकस्मिक दुर्घटना हो सकती थी करीब 12 वर्षों के अनवरत प्रयास के बाद हम इस लक्ष्य को प्राप्त कर सके और मंदिर की मूर्ति स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा हुई ।हमारे लिए बड़ा ही सौभाग्य रहा कि जिन बाबा नारायण दास जी महाराज ने इस मंदिर की आधारशिला रखी थी उन्हीं के हाथों इस मंदिर की मूर्ति स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा हुई ।ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद ।सभी ग्राम वासियों का बहुत-बहुत धन्यवाद,और उन सभी दानदाताओं का बहुत-बहुत धन्यवाद जिन्होंने इस मंदिर के निर्माण में सहयोग दिया भाई कृपाल सिंह भाई विनोद जी जिन्होंने दिल्ली से जाकर के और अन्य अपने मिलने वालों से सहयोग लेकर इस मंदिर को पूर्ण कराया दिल्ली से भी हमें बहुत सहयोग मिला। हर जगह से सहयोग मिला जिसके कारण हम इस कार्य को पूर्ण करा सके ।हम सभी दानदाताओं का और उन सभी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सहयोगियों का धन्यवाद व्यक्त करते हैं जिनकी वजह से इस मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हो सका। सभी दानदाताओं का मैं फिर से पुनः हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं और सभी दानदाताओं के उज्जवल भविष्य की कामना करता हूं कि सभी अपने सपरिवार सहित सुख एवं समृद्धि को प्राप्त हो । सभी पर ईश्वर की कृपा बनी रहे। इसमें हम उन गुप्त दानदाताओं का भी हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने अपने नाम की चाह ना रखते हुए हम को निर्देशित किया था कि हम जो दान दे रहे हैं उसका कहीं भी उल्लेख न किया जाए ।ऐसे सभी दानदाताओं का भी बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद एवं आभार की दान तो करते हैं लेकिन अपने नाम की प्रसिद्धि की अभिलाषा नहीं रखते हैं। हे ईश्वर तूने मेरे कार्य को सिद्ध करने में बहुत सहायता की ईश्वर के आशीर्वाद के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता अतः ईश्वर का आशीर्वाद प्रत्येक कार्य में बहुत आवश्यक है और मैं अपनी कमेटी के सभी कार्यकर्ताओं का भी आभार व्यक्त करता हूं कि जिन्होंने मुझ पर विश्वास रखा और मुझे इस मंदिर के निर्माण का दायित्व सौंपकर मुझ पर बहुत विश्वास जताया सारे आय-व्यय का ब्यौरा मेरे पास रहा। इन 12 वर्षों में किसी भी कार्यकर्ता या ग्रामवासी ने कभी भी मुझसे दान आदि का ब्यौरा नहीं मांगा, नहीं जानना चाहा कि कितना पैसा आया और कितना पैसा खर्च हुआ मैं कई बार कहता था कि वह मुझसे एक बार बैठ कर के जो खर्च हुआ है और जो दान आया है उसका हिसाब किताब ले लो लेकिन सभी कहते थे नहीं डाॅ॰ साहब मुझे आप पर पूरा भरोसा है आप जो कर रहे हैं सही कर रहे हैं और जबकि हम कोई बहुत उम्रदराज नहीं हैं। हम से अधिक उम्र दराज और अनुभवी व्यक्ति गांव में और हमारी कमेटी में है लेकिन सभी लोग मेरी राय को सर्वोपरि रखते थे और मुझसे पूछे बगैर कोई काम नहीं करते थे मेरी इच्छा को ही सर्वोपरि रखते थे अगर उनके मन में कोई इच्छा होती थी तो वह अपनी इच्छा को प्रकट नहीं करते थे और मेरी राय लेकर ही सारे कार्य करते थे मेरी राय को ही सर्वोपरि रखते थे तो इस विश्वास के लिए, इतने अटूट विश्वास के लिए अपनी कमेटी और समस्त ग्राम वासियों का आभार प्रकट करता हूं धन्यवाद व्यक्त करता हूं कि सभी ने मुझ पर इतना विश्वास रखा और प्रभु इच्छा से मैंने भी उनके इस विश्वास को कायम रखा और आगे भी कायम रखूंगा। इस मंदिर के निर्माण से लेकर प्राण प्रतिष्ठा तक मैंने भी तन मन धन से सहयोग दिया और आगे भी सहयोग देता रहूंगा। प्रभु मुझे इस योग्य बनाए रखें कि मैं इस मंदिर के कार्य में हमेशा सहयोगी रहूं और इस मंदिर को दिव्य और भव्य बनाने में अपना तन मन धन दे सकूं पुनः सभी दानदाताओं सभी कार्यकर्ताओं सभी ग्राम वासियों, बाबा नारायण दास, ज्ञात एवं अज्ञात सहयोगियों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं। इस पोस्ट में किसी भी व्यक्ति का नाम लिखना मेरा उद्देश्य नहीं है और मेरी इच्छा है इस मंदिर में जिन भक्तों ने सहयोग दिया है अपना तन मन धन दे कर इस मंदिर की सेवा की है सभी के नाम उस परमपिता परमात्मा के संज्ञान में है अतः किसी भी भक्त का चाहे वह मैं हूं या कोई और किसी का भी नाम किसी भी दानदाता का नाम सिलापट पर ना लिखा जाए सभी का दान सभी का सहयोग गुप्त रहेगा प्रभु हमारे कर्मों को जानने वाला है हम सब कमेटी वाले किसी नाम या प्रसिद्धि की आशा से इस कार्य को नहीं कर रहे हैं प्रभु हमारे कर्मों को देखने वाला है। हम सब बहुत खुश हैं।ईश्वर की प्रसिद्धि हो। ईश्वर की जय हो । सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय हो।हम सब तो ईश्वर के सेवक हैं।

03/07/2023

जब हम मूर्ति पूजा का ख़ंडन करते हैँ तो लोग ये तर्क करते हैं----
वे कहते है की अगर आप अपने पिता की तस्वीर पर नहीं थूक सकते तो फिर मूर्ति का तिरस्कार क्यों करते है ।
उत्तर : हम मूर्ति का तिरस्कार नहीं वरन मूर्ति को ईश्वर मान उसको पूजने का विरोध करते हैं।हम पिता की तस्वीर अपने घर में लगाते है क्योंकि वह हमारे प्रिय हैं। हमारे आदर्श है किन्तु उस तस्वीर को पिता समझ कर पिता की तरह व्यवहार नही करते। तस्वीर से धन नही मांगते ,सहायता नहीं मांगते क्योकि यह जानते है कि यह पिता की तस्वीर है पिता नहीं ,पिता की तरह चेतन नही है , यह जड़ है, ना सुनती है , ना देखती है ओर ना प्रतिक्रिया करती है।सबसे बड़ी बात , अगर पिता जीवित है तो सिर्फ उस चेतन पिता से चर्चा करके ही कुछ प्राप्त किया जा सकता , उनकी जड़ तस्वीर या मूर्ति से नही। अगर हमारे जीवित पिता हमे अपनी तस्वीर से बात करते देंखे तो वे हमें मूढ़ समझेंगे, बुद्धिहीन समझेंगे ओर क्रोध भी करेंगे ।क्या यही गलती हम उस चेतन ईश्वर के सम्बन्ध में नही कर रहे है??वह परमपिता परमात्मा जीवित है , चेतन है , हमारे ह्र्दय में है , फिर भी हम उसकी जगह मूर्तियों से मांगते है, जो जड़ है , हम जड़ वस्तुओं से बात करते है ईश्वर समझ कर । क्या ईश्वर यह देखकर प्रसन्न होगा??ईश्वर का कोई रूप रंग आकर नहीं होता फिर एक मनुष्य जैसी आकृति ईश्वर का प्रतिक कैसे आभासित करवासकती है??और चलो करवा भी दिया तो फिर मूर्ति में जरा भी टूट होते ही फेंक क्यों देते हो , फिर उसका भगवान् मर गया ?? गायब हो गया??क्यों नहीं सड़को पर पड़ी टूटी फूटी मूर्तियो को भी उठा लाते हो ??सच तो ये है तुम लोग मूर्तियो में ईश्वर का प्रतिक नहीं देखते बल्कि मूर्ति को ही भगवान् माने बैठे हो , वो भी एक ख़ास समय और स्तिथि में जब उसमे कोई मुर्ख पाखंडी पंडा आकर प्राण ना फूँक देतभी और जब तक वह खंडित ना हो जाए तब तक ।इससे आगे पीछे की स्तिथियों में वे ही मूर्तियां सड़को पर पड़ी रहती है।
2 : दूसरा तर्क है मूर्ति में भी भगवान है क्योकि वह कण कण में है तो मूर्ति को ही क्यों नहीं पूजते?
उत्तर : ईश्वर तो कण कण में है परंतु मूर्ति उसने नहीं बनाई , मूर्ति तो मनुष्य ने बनाई , ईश्वर ने बनाया फूल तो बताओ कौन बड़ा मूर्ति या फूल , तुम छोटी वस्तु पर बड़ी वस्तु चढ़ाते हो ।वह ईश्वर सर्वव्यापक है और तुम उसे एक छोटी सी मूर्ति में सिमित कर देते हो ।जब किसी से मिलना होता है तो उस स्थान पर हमारा ओर जिससे मिलना हो उसकी एक साथ उपस्तिथि आवश्यक है ।उदाहरण के लिए , अगर मुझे अपने योगी जी से मिलना हो तो या तो मुझे लखनऊ आना पड़ेगा या योगी जी को हमारे बरेली आना पड़ेगा ।इसी प्रकार अगर ईश्वर का साक्षत्कार करना है तो ईश्वर ओर हमे एक स्थान पर उपस्थित होना पड़ेगा ।हम से आशय हमारा शरीर नही बल्कि हमारी आत्मा से है।अर्थात वह स्थान बताइये जहां हमारी आत्मा ओर ईश्वर एक साथ उपस्थित हो।ईश्वर तो सर्वव्यापक होने से मूर्ति में भी है, आपके शरीर के भीतर भी है।अब आप कहाँ कहाँ है ??क्या आप मूर्ति के भीतर है ??क्या आप संसार की किसी भी वस्तु के भीतर है??आप सिर्फ अपने शरीर के भीतर है , यही वह स्थान है जहां आपका ईश्वर से साक्षात्कार सम्भव है , अन्यथा कही नही।यह मेरे विचार नही अपितु वेद वाणी है जो तर्क की कसौटी पर भी खरी उतरती है।वेद अंतिम प्रमाणवेद निंदक नास्तिकों अस्तिचिंतन करे, ओर ईश्वर को अपने भीतर खोजे ओर उसका तरीका भी वेदो में ही है जिसे महृषि पतंजलि ने अष्टांग योग के नाम से प्रचारित किया है।
3: तीसरा तर्क एकाग्रता के लिए मूर्ति जरुरी है*उत्तर : मूर्ति पर एकाग्रता किस लिए बढ़ा रहे हो , क्या मूर्ति भगवान् है , नहीं मूर्ति भगवान नहीं । मूर्ति को एकाग्रचित होकर भगवान् समझने से भी वह भगवान् नहीं बनेगी , मूर्ति ही रहेगी ।और किसी दिन टूट गयी 20 साल की एकाग्रता को ठेष पहुचेगी किन्तु आप फिर भी आप बिना मूर्ति के उपासना नही करेंगे बल्कि दूसरी मूर्ति खरीद लाओगे।सभी मूर्तिपूजक ये दावा करते है कि एक दिन मूर्तिपूजा करते करते एकाग्रता इतनी अधिक हो जाएगी किमूर्ति छूट जाएगी और ध्यान निराकार पर लग जायेगा।यह झुठ है क्योंकि निराकार पर ध्यान तभी लगेगा जब निराकार उपासना विधि आर्थत अष्टांग योग का प्रयास करोगे।इसीलिए एक 10 साल का बालक मूर्तिपूजा करते करते 80 साल का हो जाता है किंतु मूर्तिपूजा नहीछोड़ताअष्टाङ्ग योग विधि अपना कर कोई भी व्यक्ति एकाग्रता भी बढ़ा सकता है और निराकार ईश्वर का ध्यान भी कर सकता है ।

चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
21/06/2023

चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

"कहता है इतिहास जगत में,हुआ एक ही नर ऐसा   रण में कुटिल काल सम क्रोधी , तप में महासूर्य जैसा"...      केरल के मार्शल आर्...
22/04/2023

"कहता है इतिहास जगत में,हुआ एक ही नर ऐसा
रण में कुटिल काल सम क्रोधी , तप में महासूर्य जैसा"...
केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली वदक्कन कलरी के संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु #भगवान_परशुराम_जन्मोत्सव एवं #अक्षय_तृतीया के पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ....🙏🚩🚩
जय श्री परशुराम ,जय श्री राम

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नवादा बिलसंडी फरीदपुर
Bareilly
243503

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9756317025

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