Bhartiy Sahushreshthi Community

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साहुश्रेष्ठी समाज की शैक्षणिक,आध्यात्मिक, पारिवारिक और सामाजिक विकास के लिए गठित सर्वग्राह्य मंच

04/01/2026

🚩🕉अति उत्तम सत्यम् शिवम् सुन्दरम् नयनाभिराम प्रकरण🌹💐✨🙏

12/11/2025
21/10/2025

शत्रु हो तो रावण जैसा 🚩🙏 युद्ध के पहले का एक मार्मिक प्रसंग 🚩 जब श्री राम रावण युद्ध शुरू होने वाला था तो राम ने कहा मैं युद्ध शुरु होने से पहले लंका विजय के लिए एक यज्ञ करना चाहता हूं और उसके लिए मुझे एक महापंडित चाहिए जो शैव अर्थात शिव को पूजने वाला और मेरी तरह वैष्णव हो,, तो जामवंत ने कहा प्रभू इस युद्ध भूमि ऐसा महापंडित मिलना असंभव है लेकिन मैं एक ऐसे पंडित को जानता हूं जो शिव भक्त भी है और आप की तरह वैष्णव भी लेकिन वो आप का पुरोहित बनेगा नही तो श्री राम ने उस पंडित का नाम पूछा तो जामवंत ने कहा उसका नाम रावण है,, थोड़ी देर चुप रहने के बाद श्री राम ने कहा आप लंका जाइए और रावण से कहिए क्या वो मेरे पुरोहित बनेंगे तब जामवंत रावण के पास जाते हैं और कहते हैं,, हे महापंडित रावण मेरे साथ दो लोग हैं जो आप से यज्ञ करवाना चाहते हैं क्या आप उनका पुरोहित होना स्वीकार करेगे तो रावण ने बिना हां ना कहे पूछा कही आप अयोध्या से निर्वासित राजकुमारों की बात तो नही कर रहे हैं तो जामवंत ने कहा, हां फिर रावन ने एक प्रश्न किया क्या यज्ञ का उद्देश्य लंका विजय है तो फिर जामवंत ने कहा, हां इसके बाद भी क्या आप उनके पुरोहित बनेंगे तो रावण ने कहा किसी पंडित के दरवाजे पर कोई यज्ञ करने के लिए आमंत्रित करे तो उसे एक पंडित कैसे अस्वीकार कर सकता है,, आप उनसे कहिए मैं उनका पुरोहित बनने को तैयार हूं,, तब रावण ने नवो ग्रहों को बुलाया और यज्ञ के लिए सुभ मुहर्त निकालने को कहा और मुहूर्त निकला अगले दिन भोर में 5 बजे का,, तब जामवंत ने कहा लेकिन आप पूजा के लिए सामग्री बता दीजिए तब रावण ने जवाब दिया हमारे यजमान तो वनवासी हैं उनके पास पूजा की कुछ सामग्री कम पड़ जाय तो पुरोहित का कर्तव्य है पूरी सामग्री खुद अपने पास से ले जाए,, क्यों की रावण जानता था राम विवाहित हैं और विवाहित पुरुष के बगल में उसकी पत्नी ना बैठे तो पूजा पूर्ण नही होती है और मैं अपूर्ण पूजा नही कर सकता,, इसके बाद जामवंत चले और रावण अशोक वाटिका सीता के पास गया और सीता से कहा तुम्हारा पति एक यज्ञ करने वाला है जिसमे मैं उसका पुरोहित हूं,, कल मेघनाथ सुबह रथ लेकर आएगा तुम उस पर बैठ जाना और उसके साथ यज्ञ स्थल पर चले जाना और यज्ञ खत्म होने के बाद फिर वापस लंका चली आना,, इसके बाद सुबह रावण यह स्थल पर पंहुचा यह देख कर राम और लक्ष्मण ने रावण के पैर छुए और आशीर्वाद लिया, रावण ने यज्ञ शुरु करने से पहले राम से पूछा तुम्हारी पत्नी कहां हैं तो राम ने कहा पुरोहित जी उनका हरण हो गया है तब रावण ने राम से कहा मैंने तो पहले ही कह दिया अगर मेरे यजमान के यज्ञ में कुछ पूजन सामग्री कम पड़ जायेगी तो पुरोहित का कर्तव्य है की उसको उपलब्ध कराए तब उसने मेघनाथ से कहा पुत्र सीता को राम के बगल में बैठा दो तब सीता को उनके बगल में बैठा कर रावण ने यज्ञ पूर्ण कर शिवलिंग की स्थापना की और नाम रखा रामेश्वर 🚩 अर्थात राम ही ईश्वर है और ईश्वर ही राम। यज्ञ पूर्ण होने के बाद राम ने रावण से कहा आचार्य आप अपनी दक्षिणा बताईए तो रावण ने कहा यजमान समय आने पर ले लूंगा तब राम ने कहा ठीक है आचार्य बता तो दीजिए आप को क्या चाहिए तब पता नही उस समय आप को दक्षिणा देने की स्थिति में रहूं या नही,, तब रावण ने राम से कहा यजमान मुझे दक्षिणा में बस यही चाहिए की जब मेरी मृत्यु हो तो मेरे सामने दोनों भाई मौजूद हों,, यह सुन कर राम की आंखे भर आई और दोनों भाई रावण का पैर छूते हुए कहा ऐसा हो होगा आचार्य... इसी लिए हम कहते हैं राम को तो छोड़ो हम रावण का भी अपमान सहन नही कर सकते,,, जय श्री राम 🚩 जय सनातन 🙏🙏

20/10/2025
15/09/2025

सरसंघचालक परंपरा

संघ एक विकासशील संगठन है। केवल शाखा या विविध कार्य ही नहीं, तो अनेक परम्पराएं भी स्वयं विकसित होती चलती हैं। यहां हर काम के लिए संविधान नहीं देखना पड़ता। बाहर से देखने वाले को शायद यह अजीब लगता हो; पर जो लोग संघ और उसकी कार्यप्रणाली को लम्बे समय से देख रहे हैं, वे इसकी वास्तविकता से परिचित हैं। उनके लिए यह सामान्य बात है।

यदि हम सरसंघचालक परम्परा को देखें, तो परम पूजनीय डाक्टर हेडगेवार को उनके सहयोगियों ने बिना उनकी जानकारी के सरसंघचालक बनाया। डॉ॰ जी ने इस अवसर पर कहा कि आपके आदेश का पालन करते हुए मैं यह जिम्मेदारी ले रहा हूं; पर जैसे ही मुझसे योग्य कोई व्यक्ति आपको मिले, आप उसे यह दायित्व दे देना। मैं एक सामान्य स्वयंसेवक की तरह उनके साथ काम करूंगा। जब डाक्टर जी का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया, तो उन्होंने अपने सहयोगियों से परामर्श कर अपने ऑपरेशन से पूर्व सबके सामने ही श्री गुरुजी को बता दिया कि मेरे बाद आपको संघ का काम संभालना है। इस प्रकार संघ को द्वितीय सरसंघचालक की प्राप्ति हुई।

जब श्री गुरुजी को लगा कि अब यह शरीर लम्बे समय तक साथ नहीं दे पाएगा, तो उन्होंने भी अपने सहयोगी कार्यकर्ताओं से परामर्श किया और एक पत्र द्वारा श्री बालासाहब देवरस को नवीन सरसंघचालक घोषित किया। वह पत्र उनके देहांत के बाद खोला गया था। बालासाहब ने श्री गुरुजी के देहांत के बाद यह जिम्मेदारी संभाली, इससे लोगों के मन में यह धारणा बनी कि यह जिम्मेदारी आजीवन होती है तथा पूर्व सरसंघचालक अपनी इच्छानुसार किसी को भी यह दायित्व दे सकते हैं।

परंतु श्री बालासाहब देवरस ने अपने पूर्व के दोनों सरसंघचालकों द्वारा अपनायी गयी विधि से हटकर नये सरसंघचालक की नियुक्ति की। उन्होंने स्वास्थ्य बहुत खराब होने पर अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में सब प्रतिनिधियों के सम्मुख श्री रज्जू भैया को नया सरसंघचालक घोषित किया। मा० रज्जू भैया और फिर श्री सुदर्शन जी ने भी इसी विधि का पालन किया। इस प्रकार संघ में एक नयी परम्परा विकसित हुई।

इस घटनाक्रम को एक और दृष्टिकोण से देखें। जब बालासाहब ने दायित्व से मुक्ति ली, तब उनका स्वास्थ्य बहुत खराब था। वे पहिया कुर्सी पर ही चल पाते थे। बोलने में भी उनको बहुत कठिनाई होती थी। उनके लिखित संदेश ही सब कार्यक्रमों में सुनाए जाते थे। अपनी दैनिक क्रियाएं भी वे किसी के सहयोग से ही कर पाते थे। इस कारण उनकी दायित्व मुक्ति को सबने सहजता से लिया।

दूसरी ओर रज्जू भैया ने जब कार्यभार छोड़ा, तो वे पूर्ण स्वस्थ तो नहीं; पर प्रवास करने योग्य थे। सार्वजनिक रूप से मंच पर बोलने में उन्हें भी कठिनाई होती थी; पर व्यक्तिगत वार्ता वे सहजता से करते थे। दायित्व से मुक्त होकर भी उन्होंने अनेक प्रान्तों का प्रवास किया। अर्थात यदि वे चाहते, तो दो-तीन वर्ष और इस जिम्मेदारी को निभा सकते थे; पर उन्होंने उपयुक्त व्यक्ति पाकर यह कार्यभार छोड़ दिया।

जहां तक पांचवे सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी की बात है, दायित्व मुक्ति तक वे काफी स्वस्थ थे। प्रवास के साथ-साथ सार्वजनिक रूप से बोलने में उन्हें कुछ कठिनाई नहीं थी। फिर भी जब उन्हें लगा कि श्री मोहन भागवत के रूप में एक सुयोग्य एवं ऊर्जावान कार्यकर्ता सामने है, तो उन्होंने भी जिम्मेदारी छोड़ दी। स्पष्ट है कि उन्होंने वही किया, जो आद्य सरसंघचालक डॉ॰ हेडगेवार ने पदभार स्वीकार करते समय कहा था कि जब भी मुझसे अधिक योग्य कार्यकर्ता आपको मिले, आप उसे सरसंघचालक बना दें। मैं उनके निर्देश के अनुसार काम करूंगा। यह है एक परम्परा में विश्वास और दूसरी परम्परा का विकास। पुरानी नींव पर नये निर्माण का इससे अधिक सुंदर उदाहरण और क्या होगा ?

एक अन्य दृष्टि से विचार करें। पूज्य डॉ॰ जी के देहांत के बाद उनका दाह संस्कार रेशीम बाग में हुआ। आज वहां उनकी समाधि बनी है, जिसे ‘स्मृति मंदिर’ कहते हैं। उसका बाह्य रूप मंदिर जैसा है; पर वहां पूजा, पाठ, घंटा, भोग, आरती, प्रसाद आदि कुछ नहीं है। वहां डाक्टर जी भव्य प्रतिमा है, जो तीन ओर से खुली है। स्पष्ट है संघ में व्यक्ति का महत्व होते हुए भी व्यक्ति पूजा के लिए कोई स्थान नहीं है।

द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी ने अपने देहांत से पूर्व तीन पत्र लिखे थे। दूसरे पत्र में ही उन्होंने कह दिया था कि डाक्टर जी की तरह उनका कोई स्मारक न बनाएं। कार्यकर्ताओं ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए स्मृति मंदिर के सामने उनका दाह संस्कार किया। आज वहां यज्ञ ज्वालाओं के रूप में एक छोटा ‘स्मृति चिन्ह’ बना है। उस पर संत तुकाराम की वे पंक्तियां उत्कीर्ण हैं, जिनको उद्धृत करते हुए श्री गुरुजी ने अपने तीसरे पत्र में सब स्वयंसेवकों से क्षमा मांगी थी।

श्री बालासाहब देवरस इससे एक कदम और आगे गये। उन्होने कार्यकर्ताओं से पहले ही कह दिया था कि रेशीम बाग को हमें सरसंघचालकों का श्मशान स्थल नहीं बनाना है। इसलिए मेरा अंतिम संस्कार सामान्य श्मशान घाट पर किया जाए। बालासाहब का देहांत पुणे में हुआ; पर उन्होंने नागपुर में अपने जीवन का काफी समय बिताया था। उनके अनेक मित्र व सम्बन्धी वहां थे, जो उनके अंतिम दर्शन कर श्रद्धांजलि देना चाहते थे। अत: उनके शरीर को नागपुर लाकर गंगाबाई घाट पर अग्नि को समर्पित किया गया।

बालासाहब के ही समान रज्जू भैया का देहांत भी पुणे में हुआ। उन्होंने एक बार यह इच्छा व्यक्त की थी कि उनकी मृत देह को नागपुर या दिल्ली लाने की आवश्यकता नहीं है। जहां उनका देहांत हो, वहीं उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाए। इसी कारण उनका दाह संस्कार पुणे में हुआ। सुदर्शन जी का देहांत रायपुर में हुआ। उनके पार्थिव शरीर को नागपुर लाया गया।संघ के कुछ कार्यकर्ता उनके पार्थिव शरीर को एक रथ से अंतिम संस्कार के लिए रेशमीबाग से गंगा बाई घाट ले गए।

स्पष्ट है कि सभी सरसंघचालकों ने स्वयं को विशिष्ट से सामान्य व्यक्तित्व की ओर क्रमश: अग्रसर किया। संघ और समाज एकरूप हो, यह बात संघ में प्राय: कही जाती है। सरसंघचालकों ने अपने व्यवहार से इसे सिद्ध कर दिखाया।

किसी समय संघ पर मराठा और ब्राह्मणवादी होने का आरोप लगाया जाता था; पर उत्तर प्रदेश के प्रो॰ राजेन्द्र सिंह और कर्नाटकवासी सुदर्शन जी के सरसंघचालक बनने के बाद इन लोगों के मुंह सिल गये। २००९ में मोहन भागवत के सरसंघचालक और सुरेश जोशी के सरकार्यवाह बनने के बाद ये वितंडावादी फिर चिल्लाये; पर अब किसी ने उन्हें घास नहीं डाली। सब समझ चुके हैं कि ऐसे आरोप बकवास के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं।

जो लोग संघ को लकीर का फकीर या पुरानी परम्पराओं से चिपटा रहने वाला कूपमंडूक संगठन कहते हैं, उन्हें सरसंघचालक परम्परा के विकास का अध्ययन करना चाहिए। अभी संघ ने अपनी शताब्दी नहीं मनाई है; पर इसके बाद भी इस परम्परा में अनेक परिवर्तन हुए हैं। यह संघ की जीवंतता का प्रतीक है और इसी में संघ की ऊर्जा का रहस्य छिपा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालकों की सूची:

1. डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टर साहब
(1925-1940)
2. माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य गुरूजी (1940-1973)
3. मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहेब देवरस
(1973-1993)
4. प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया
(1993-2000)
5. कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य सुदर्शनजी
(2000-2009)
6. डॉ॰ मोहनराव मधुकरराव भागवत
(2009 से वर्तमान तक)

15/08/2024

ये ग्रेटर बांग्लादेश का नक्शा है ,,,,जमात ए इस्लामी का brainchild,, इसमें संपूर्ण बंगला भाषी क्षेत्रों को सम्मिलित कर एक स्वतंत्र राष्ट का सपना सजोया गया है,,जिसमे बांग्लादेश,बंगाल,असम,झारखंड,,,,ओरिसा के कुछ हिस्से,त्रिपुआ,नेपाल का भी एक जिला तथा म्यांमार का रोहिंग्या बहुल रखाइन प्रांत सम्मिलित है,,,
ब्रिटिश काल में जब मुस्लिम लीग ने भारत विभाजन का प्रस्ताव रखा था तो जमात ए इस्लामी और अबुल कलाम आजाद ने इसका विरोध किया था,,इसलिए नहीं को उन्हे भारत से कोई लगाव था,उनका तर्क ये था कि विभाजन से भारत का मुस्लिम दो भागों में विभाजित हो जायेंगे ,ऐसे में उनकी ताकत क्षीण पड़ जायेगी ,,और अगर हम विभाजित न हुए तो एकजुट होकर हम हिंदुओं को दाम दाम दण्ड के द्वारा इस्लाम में परिवर्तित कर लेंगे व संपूर्ण भारत को सब्ज हिलाली इस्लामी परचम तले आसानी से ला सकेंगे .
विभाजन उपरांत जमात ए इस्लामी भी तीन देशों में विभाजित हो गया,,मगर मकसद तीनों का एक ही है,,भारतीय उपमहाद्वीप का इस्लामीकरण करना,, व हिंदुओं को धर्मांतरित करना,,,,हाल में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट व हिंदू विरोधी दंगों में भी इसी जमात के लोगों ने ही हिंदुओं की हत्याएं की हैं व मंदिर व संपति को लूटा है
' बड़े मियां ' मुस्लिम लीग तो भारत के दोनो बाजू काट कर पाकिस्तान हासिल कर चुके थे,,,अब 'छोटे मियां ' जमात के बारी थी भारत को जख्म देने की,,तो हुजूर 90 के दशक से ग्रेटर बांग्लादेश का ख्वाब संजो बैठे,,,और अपनी दराती को धार दे रहे हैं,,,अब तक ग्रेटर बांग्लादेश की बात महज किस्सागोई लगती थी,मगर हाल में हुए बांग्लादेश हिंदू नरसंहार और सोशल मीडिया पर खूब छाए ग्रेटर बांग्लादेश के नक्शों ने डायरेक्ट एक्शन डे की याद दिला दी..
दोनो देशों में संयुक्त बांग्लाभाषीयों का यदि अनुपात देखें तो हिंदू आबादी महज 31% है, जबकि मुस्लिम आबादी 68% तथा अन्य(बौद्ध ईसाई) मात्र 1% हैं,,,इस पर भारत में पलनेवाल रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों का 'निवेश ' तो हैं ही,,सोने पे सुहागा भारत का एकजुट ' वोट बैंक समुदाय ' जोकि ' तेरा मेरा रिश्ता क्या ?...' पुकारते ही प्रतिउत्तर में चिल्ला उठाएगा ...la #@*
याद कीजिए टुकड़े गैंग के जिहादी शरजील इमाम ने ' चिकन नेक ' कॉरिडोर का जिक्र किया था,बंगाल में स्थित मात्र 22 km चौड़ाई का ये गलियारा भारत को उसके उत्तर पूर्वी भाग ' Seven Sisters ' से जोड़ता है,,शरजील इमाम तो इस चिकन नेक को मरोड़ कर शेष भारत का दम घोटने का षड्यंत्र बना रहा था,,बांग्लादेशी जमात ए इस्लामी तो ये पूरा इलाका ही निगलने का मंसूबा बना रही है,,,,जाहिर सी बात है भारत में मौजूद जमात ए इस्लामी हिंद इसमें भरपूर सहयोग देगी,,,क्योंकि आखिर ' तेरा मेरा रिश्ता क्या ' ,,, तब भारत में भी वोही नंगा नाच होगा जो पिछले दिनों बांग्लादेशी हिंदुओं के साथ हुआ
बात सीधी सी है,,,भारत के टुकड़ों पर पलनेवाला भूखा नंगा कुत्ता अब भारत को हो नोचने की फिराक में है,,,,और कुत्ता जब पागल हो जाए तो उसके सर पर गोली मारी जाती है
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