01/06/2026
"साथियों, आज हम Constitution Club of India, New Delhi में IMPA की
12 National Conference का आयोजन करने जा रहे हैं। आज के इस कार्यक्रम में हमारे मुख्य विषय हैं—स्वास्थ्य (Health), संविधान (Constitution) और जाति (Caste)।
अगर हम ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो एक खास वर्ग की मानसिकता में यह पहले से ही तय है कि सामाजिक व्यवस्था को किस ढर्रे पर चलाना है। भले ही इस देश में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की बदौलत 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हो गया, लेकिन आज भी एक वर्ग की सोच यही है कि वंचितों को उनके अधिकारों से दूर ही रखा जाए। राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने अपने साहित्य में स्पष्ट लिखा है कि वर्चस्ववादी व्यवस्था अपनी सर्वोच्चता (ब्राह्मणवादी व्यवस्था) को कभी स्वेच्छा से नहीं छोड़ेगी। वे अपने इस सामाजिक ढांचे को बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं।
संविधान लागू होने के 75 वर्षों के बाद भी, हमारे समाज के बड़े हिस्से को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं (Health facilities) नहीं मिल पाई हैं। यही स्थिति शिक्षा, रोजगार और सबसे बढ़कर सुरक्षा (Law and Order) की भी है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में, विशेषकर कुछ राज्यों में, हमारे समाज के लोगों को जान-बूझकर झूठे मुकदमों में फंसाकर जेलों में धकेल दिया जाता है।
शिक्षा का मुद्दा अत्यंत गंभीर है। शिक्षा व्यवस्था का पूरी तरह से निजीकरण (Privatization) कर दिया गया है, जिससे यह बेहद महंगी हो गई है। हमारा मूलनिवासी समाज, जो आज भी गरीबी और अभावों में जीवन बसर कर रहा है, उसकी पहुंच से यह महंगी शिक्षा पूरी तरह बाहर हो चुकी है। यह एक सोची-समझी रणनीति है ताकि आपको अधिकारों से वंचित रखा जा सके और आर्थिक रूप से पंगु (Economically weak) बना दिया जाए।
राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने समाज में एक बौद्धिक वर्ग (Intellectual class) के निर्माण पर जोर दिया था। इस बौद्धिक वर्ग का काम इन उत्पन्न हो रही समस्याओं को समझना और उनके निवारण के लिए समाज को दिशा देना है। इसके लिए सबसे पहले हमारे अंदर 'सामाजिक ईमानदारी' (Social Honesty) होनी चाहिए। जब तक सामाजिक ईमानदारी नहीं होगी, तब तक 'सामाजिक जिम्मेदारी' (Social Responsibility) की भावना पैदा नहीं हो सकती।
सामाजिक ईमानदारी तभी आएगी जब हमें अपने इतिहास का सही ज्ञान होगा; जब हम यह जानेंगे कि हमारे महापुरुषों ने समाज के लिए कितना बड़ा त्याग और संघर्ष किया है। इस इतिहास बोध से ही सामाजिक आंदोलन खड़ा होगा, और इस आंदोलन को चलाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हमारे प्रबुद्ध और बौद्धिक वर्ग की है।
हमें एक ऐसे गैर-राजनीतिक संगठन और बौद्धिक वर्ग को तैयार करने की आवश्यकता है, जो सीधे धरातल पर समाज की समस्याओं से जुड़ा हो। जब तक हमारे समाज में एक मजबूत बौद्धिक और शासक जमात खड़ी नहीं होती, तब तक हमारी समस्याओं का स्थायी निवारण संभव नहीं है। हमारे महापुरुषों ने शिक्षा पर इसीलिए जोर दिया था ताकि इस देश में शोषितों का अपना एक नेतृत्व और शासक वर्ग तैयार हो सके, जो समाज की मुश्किलों को दूर कर सके।
अंत में, मैं यही कहूंगा कि हमारे बौद्धिक वर्ग को अब पहल करनी होगी, आगे आना होगा। दुश्मन ने हमारे समाज के पैरों में गुलामी की जो अदृश्य जंजीरें डाल रखी हैं, उन्हें काटने के लिए इस प्रबुद्ध वर्ग को अपना सर्वस्व योगदान देना होगा। - DR. Satpal
जय भीम, जय जोती!"