कत्यूरघाटी गरुड़

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हम गरुड़ वासी
06/06/2026

हम गरुड़ वासी

06/06/2026

बेसक दिल्ली जंतर मंतर पर युवा एकजुट हो रहे है लेकिन हमारे गरुड़ में सुख शांति है यहाँ परीक्षाओं के चक्कर में पड़ने के बजाय सिर्फ़ नेताजी की जय जय कार करने से ही काम हो जाता है कभी ना कभी सरकार का कोई पद मिल ही जाएगा इस प्रत्याशा में स्कूल, पुस्तकालय और प्रशिक्षण केंद्र की तरफ़ रूख करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है .

हाँ जब तक आपको रेवड़ी नहीं मिलती तब तक छोटी मोटी ठेकेदारी , खनन, शराब बियर बार आदि को अपना ज़रिया बना लेने की नेता जी की सलाह को हाथोहाथ ले हमारे गरुड़ वासी सुकून से हैं.

आंदोलन? ये तो बीते जमानों की बात हो गयी.
रही बात विपक्ष की तो वो भी मित्रवत भाव से अपना समय निकाल ही चुके है और उनके समर्थक अब पाला भी बदल चुके हैं.

31/05/2026

जल ही जीवन है
अगर जल उपलब्ध कराने में जल संस्थान असफल रहा तो तब क्या उक्ति बनेगी ?

करीब 6 माह पूर्व हमारे घर के पास से गुजरने वाली सड़क का डामरीकरण हुआ जिसके चलते मेरे बड़े भाई और छोड़े भाई दोनों की पेय जल पाइप लाइन जो सड़क में भूमिगत बिछी थी क्षतिग्रस्त हो गयी. पानी की आपूर्ति ठप हो गयी. चूँकि में कभी कभी गरुड़ आ पाता हूँ पानी की आपूर्ति के ठप होने से परेशान परिवार जनों ने जल संस्थान के जिम्मेदार लोगों को अपनी परेशानी से अवगत करने के बाद जब महीने भर तक कोई कार्यवाही नहीं हुई तो यह सब मुझे बताया मैंने तुरंत ही करीब ३ महीने पहले जल संस्थान की AE अंजलि नेगी जी को फोन पर यह समस्या बतायी और जल आपूर्ति सुचारू करने के लिए कहा AE साहिबा ने कहा कि आप चिंता ना करें जल्द ही समस्या का समाधान हो जाएगा. अगली बार एक महीने के बाद जब में गरुड़ आया मैंने घर वालों से जानकारी जी तो पता चला समस्या जस की तस है पुनः मैंने AE साहिबा को कॉल करके पुनःस्मरण कराया उन्होंने फिर से वही आश्वासन दोहराया. अगले महीने जब मैं गरुड़ आया घर में पूछा तो समस्या वही की वही खड़ी मिली मैंने पुनः कॉल किया लेकिन अब की बार AE अंजलि नेगी जी का ने कॉल रिसीव नहीं किया. पूर्व ग्राम प्रधान भोला दत्त पांडे जी को मैंने कॉल किया कि इस समस्या के निराकरण के लिए अपने स्तर से अंजलि नेगी जी से बात करके कर दें. चूँकि मैं गरुड़ आया भी तो सप्ताहांत में आता हूँ और कार्यदिवस में मुझे कोर्ट नैनीताल को जाना होता है जिस कारण मेरा जल संस्थान के कार्यालय में जाना संभव नहीं हो पाता और मैं यह उम्मीद लेकर चला जाता हूँ कि जिम्मेदार अधिकारी अपना कार्य ईमानदारी से कर लेंगे.

कल मैंने जब घर में भाभी जी जानकारी लेनी चाही कि पानी की आपूर्त सुचारू हुई या नहीं जबाब वही था कि नहीं .

मुझे बहुत दुख हुआ यह जानकर कि हमारे संस्थान और उनके जिम्मेदार अधिकारी अपने कर्तव्य के प्रति कितने संवेदनशीलहीन है पेय जल 💧 जैसे जरूरी चीज वह भी प्रकृति से पास में ही उपलब्ध हो ना बिजली ना मोटर सिर्फ गुरुत्व बल के सहारे स्वतः ढलान में बहकर उपलब्ध होने वाले जल को भी उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं.

पीडब्ल्यूडी की सड़क को अगर कोई व्यक्ति खोदने लगे तो उसका चालान होना ही है अतः पेयजल की आपूर्ति उनके ही द्वारा बाधित हुई है तो यह कार्य जल संस्थान और पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों के आपसी सामंजस्य से ही संभव होगा.

मान लेते है ईरान- अमेरिका युद्ध के चलते पेट्रोल की आपूर्ति में दिक्कत है लेकिन गरुड़ में पेय जल उपलब्ध कारने में क्या दिक्कत है
शराब की मांग की होती तो नेताओं की भी सिफारिश ऊपर लेबल तक चले जाती लेकिन पेयजल जैसी समस्या के लिए उत्तराखंड बागेश्वर गरुड़ का सिस्टम क्यों बैठ गया है ? ये इतनी ढीड़ AE साहिबा को किसने इतना मुंह लगाया हुआ है वो रॉब से अपनी जॉब कर ले रही है ? ऐसे अधिकारियों को जिले में किसने संरक्षण दिया है ?

अब आप कहोगे ही हाई कोर्ट में अधिवक्ता होते हुए भी आप फेसबुक व्हाट्सएप पर क्यों लिख रहे हो? मैं आपको इस सिस्टम की सच्चाई बता रहा हूँ मेरे पास वह विकल्प तो है जो आप सोच रहे है परंतु चुनावी मोड़ में आ चुके पक्ष विपक्ष की नीद कौन तोड़ेगा?

डीके जोशी, दर्शानी राममंदिर वार्ड नगर पंचायत गरुड़, ⁨093198 05337⁩

31/05/2026
28/05/2026

मन की बात

व्यक्ति का व्यवहार उसकी समझ, उसके विचार, उसकी शिक्षा और उसके अनुभवों पर आधारित होता है। हर इंसान यह भी चाहता है कि वह बीते कल से आज बेहतर स्थिति में हो और आने वाला कल आज से भी अधिक बेहतर बने।

समाज में जितने लोग हैं, उतने ही विचार, उतने ही अनुभव और उतनी ही समझ में भिन्नता देखने को मिलती है। उम्र, बुद्धि, विचार और अनुभवों में अंतर होने के कारण साथ रहने वाले लोगों के बीच तालमेल बना पाना भी अत्यंत कठिन कार्य होता है।

यदि किसी भी जीव की प्रवृत्ति की बात करें तो उसका प्राथमिक लक्ष्य स्वयं के लिए जीना ही होता है, परंतु अधिकांश जीव अपने साथ-साथ अपने रक्त संबंधियों की सुरक्षा और देखभाल भी करते हैं।

इस धरती पर इंसान ही एक ऐसी प्रजाति है जिसमें अपने स्वार्थ के साथ-साथ समाज में रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति तथा अन्य इंसानों के प्रति संवेदना और करुणा की भावना भी प्रबल रूप से विद्यमान रहती है।

कभी-कभी मैं अपने अब तक के जीवन अनुभवों के आधार पर यह सोचने को विवश हो जाता हूँ कि क्या समाज के बारे में सोचकर, अपने स्तर से सकारात्मक प्रयास करके, मैं अनजाने में अधिकांश लोगों को परेशान तो नहीं कर रहा? क्योंकि आज के समय में इंसान केवल अपने बारे में सोचने में ही इतना व्यस्त और परेशान है कि वह अक्सर दुखी ही दिखाई देता है। यदि वह दूसरों की चिंता भी करने लगे, तो शायद उसकी परेशानियाँ और बढ़ जाएँ।

जहाँ तक मेरे अपने जीवन का प्रश्न है, मैं कभी भी स्वयं के बारे में अधिक चिंतित नहीं रहा। बचपन से लेकर आज तक हमेशा अपनी चिंता से पहले दूसरों की चिंता में खोया रहा हूँ। ऐसा नहीं है कि जीवन-निर्वहन के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा; बल्कि इस भौतिक संसार में स्वयं को स्थापित करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा। फिर भी हमेशा यही भावना रही कि समाज में मेरी कुछ उपयोगिता अवश्य हो।

पिछले 35 वर्षों से निःस्वार्थ भाव से समाजहित में स्वयं को समर्पित करने का प्रयास करता रहा हूँ। विभिन्न सामाजिक कार्यों के माध्यम से हमेशा यह कोशिश रही कि एक सजग नागरिक का जो कर्तव्य होना चाहिए, उसका ईमानदारी से निर्वहन किया जाए। इतने वर्षों के प्रयासों का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ा होगा, किंतु जिन कार्यों को वास्तव में जिम्मेदार लोगों को करना चाहिए था, या यूँ कहें कि जिन कार्यों के लिए उन्हें सरकारी संसाधन और धन भी प्राप्त होता है, उन्होंने अक्सर मेरे प्रयासों को अपने विरुद्ध समझा और ऐसे सकारात्मक कार्यों को हतोत्साहित ही किया। परिणामस्वरूप अपेक्षित परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं दे पाए।

फिर भी आत्मसंतोष इस बात का है कि मैंने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। किंतु दुख इस बात का है कि समाज में सरकारी संसाधनों की चमक-दमक पर पलने वाले कुछ नेता स्वयं को समाज का मसीहा समझते हुए ऐसे प्रयासों को महत्व देने के बजाय संदेह की दृष्टि से देखते रहे। शायद यही कारण है कि मेरी 35 वर्षों की सेवा का वास्तविक लाभ समाज तक पूर्ण रूप से नहीं पहुँच पाया।

आज तक के इस व्यसनमुक्त 54 वर्ष के जीवन में न तो अपने लिए और न ही समाज सेवा के कार्यों में सरकार के किसी विभाग से एक पैसा लिया। जो कुछ भी किया, वह सब निजी संसाधनों और व्यक्तिगत प्रयासों से किया।

आप सोच रहे होंगे कि ये बातें किसे और क्यों बताई जा रही हैं। इसका उत्तर केवल इतना है कि आज के समय में सकारात्मक प्रयासों के अर्थ भी अक्सर उल्टे लगाए जाने लगे हैं। चाहे कोई व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से ही कार्य क्यों न कर रहा हो, लोग उस भावना को समझने के बजाय यह खोजने में लग जाते हैं कि आखिर इसके पीछे स्वार्थ क्या है।

मेरे अनुभव में कुछ लोग इन प्रयासों को राजनीतिक महत्वाकांक्षा का नाम देते हैं, कुछ इसे व्यक्तिगत प्रचार बताते हैं, और कभी-कभी तो लोग यह कहने से भी नहीं चूकते कि आंदोलनों की आड़ में पैसा कमाने का कोई छिपा हुआ माध्यम है।

ऐसे में कभी-कभी यह विचार भी आता है कि यदि अन्य लोगों की तरह केवल अपने जीवन और अपनी चिंताओं में ही पिछले 35 वर्ष व्यतीत कर दिए होते, तो शायद उन “सरकार-जीवी” जनप्रतिनिधियों का समय भी व्यर्थ न होता, जो जनता को डी.के. जोशी के प्रयासों के विरुद्ध भड़काने में लगे रहते हैं। और भोली-भाली जनता भी उनके प्रभाव में आ जाती है। अन्यथा बंदरों की समस्या, शराब से बर्बादी, आवारा गाय-बैलों से फसलों को नुकसान जैसी समस्याओं से मुझ जैसे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता का व्यक्तिगत रूप से क्या संबंध?

यह मेरी “मन की बात” है — केवल आज की नहीं, बल्कि अब तक के पूरे जीवन की बात। भविष्य में मन में क्या आएगा, यह भविष्य ही बताएगा।

— डी.के. जोशी
गरुड़, बागेश्वर
मो. 9319805337

अब तक १६ बार बागेश्वर विधान सभा सीट के लिए चुनाव हुए है जिसमे केवल २ बार गरुड़ से विधायक बना वो भी एक व्यक्ति स्व पूरन च...
26/05/2026

अब तक १६ बार बागेश्वर विधान सभा सीट के लिए चुनाव हुए है जिसमे केवल २ बार गरुड़ से विधायक बना वो भी एक व्यक्ति स्व पूरन चंद्र आर्य जबकि हमेशा गरुड़ के मतदाता ही बहुमत का निर्धारण करते हैं

इसलिए सभी राजनैतिक दलों से निवेदन है कि इस बार गरुड़ से ही अपना विधायक का उम्मीदवार तय करें

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