28/05/2026
मन की बात
व्यक्ति का व्यवहार उसकी समझ, उसके विचार, उसकी शिक्षा और उसके अनुभवों पर आधारित होता है। हर इंसान यह भी चाहता है कि वह बीते कल से आज बेहतर स्थिति में हो और आने वाला कल आज से भी अधिक बेहतर बने।
समाज में जितने लोग हैं, उतने ही विचार, उतने ही अनुभव और उतनी ही समझ में भिन्नता देखने को मिलती है। उम्र, बुद्धि, विचार और अनुभवों में अंतर होने के कारण साथ रहने वाले लोगों के बीच तालमेल बना पाना भी अत्यंत कठिन कार्य होता है।
यदि किसी भी जीव की प्रवृत्ति की बात करें तो उसका प्राथमिक लक्ष्य स्वयं के लिए जीना ही होता है, परंतु अधिकांश जीव अपने साथ-साथ अपने रक्त संबंधियों की सुरक्षा और देखभाल भी करते हैं।
इस धरती पर इंसान ही एक ऐसी प्रजाति है जिसमें अपने स्वार्थ के साथ-साथ समाज में रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति तथा अन्य इंसानों के प्रति संवेदना और करुणा की भावना भी प्रबल रूप से विद्यमान रहती है।
कभी-कभी मैं अपने अब तक के जीवन अनुभवों के आधार पर यह सोचने को विवश हो जाता हूँ कि क्या समाज के बारे में सोचकर, अपने स्तर से सकारात्मक प्रयास करके, मैं अनजाने में अधिकांश लोगों को परेशान तो नहीं कर रहा? क्योंकि आज के समय में इंसान केवल अपने बारे में सोचने में ही इतना व्यस्त और परेशान है कि वह अक्सर दुखी ही दिखाई देता है। यदि वह दूसरों की चिंता भी करने लगे, तो शायद उसकी परेशानियाँ और बढ़ जाएँ।
जहाँ तक मेरे अपने जीवन का प्रश्न है, मैं कभी भी स्वयं के बारे में अधिक चिंतित नहीं रहा। बचपन से लेकर आज तक हमेशा अपनी चिंता से पहले दूसरों की चिंता में खोया रहा हूँ। ऐसा नहीं है कि जीवन-निर्वहन के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ा; बल्कि इस भौतिक संसार में स्वयं को स्थापित करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा। फिर भी हमेशा यही भावना रही कि समाज में मेरी कुछ उपयोगिता अवश्य हो।
पिछले 35 वर्षों से निःस्वार्थ भाव से समाजहित में स्वयं को समर्पित करने का प्रयास करता रहा हूँ। विभिन्न सामाजिक कार्यों के माध्यम से हमेशा यह कोशिश रही कि एक सजग नागरिक का जो कर्तव्य होना चाहिए, उसका ईमानदारी से निर्वहन किया जाए। इतने वर्षों के प्रयासों का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ा होगा, किंतु जिन कार्यों को वास्तव में जिम्मेदार लोगों को करना चाहिए था, या यूँ कहें कि जिन कार्यों के लिए उन्हें सरकारी संसाधन और धन भी प्राप्त होता है, उन्होंने अक्सर मेरे प्रयासों को अपने विरुद्ध समझा और ऐसे सकारात्मक कार्यों को हतोत्साहित ही किया। परिणामस्वरूप अपेक्षित परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं दे पाए।
फिर भी आत्मसंतोष इस बात का है कि मैंने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। किंतु दुख इस बात का है कि समाज में सरकारी संसाधनों की चमक-दमक पर पलने वाले कुछ नेता स्वयं को समाज का मसीहा समझते हुए ऐसे प्रयासों को महत्व देने के बजाय संदेह की दृष्टि से देखते रहे। शायद यही कारण है कि मेरी 35 वर्षों की सेवा का वास्तविक लाभ समाज तक पूर्ण रूप से नहीं पहुँच पाया।
आज तक के इस व्यसनमुक्त 54 वर्ष के जीवन में न तो अपने लिए और न ही समाज सेवा के कार्यों में सरकार के किसी विभाग से एक पैसा लिया। जो कुछ भी किया, वह सब निजी संसाधनों और व्यक्तिगत प्रयासों से किया।
आप सोच रहे होंगे कि ये बातें किसे और क्यों बताई जा रही हैं। इसका उत्तर केवल इतना है कि आज के समय में सकारात्मक प्रयासों के अर्थ भी अक्सर उल्टे लगाए जाने लगे हैं। चाहे कोई व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से ही कार्य क्यों न कर रहा हो, लोग उस भावना को समझने के बजाय यह खोजने में लग जाते हैं कि आखिर इसके पीछे स्वार्थ क्या है।
मेरे अनुभव में कुछ लोग इन प्रयासों को राजनीतिक महत्वाकांक्षा का नाम देते हैं, कुछ इसे व्यक्तिगत प्रचार बताते हैं, और कभी-कभी तो लोग यह कहने से भी नहीं चूकते कि आंदोलनों की आड़ में पैसा कमाने का कोई छिपा हुआ माध्यम है।
ऐसे में कभी-कभी यह विचार भी आता है कि यदि अन्य लोगों की तरह केवल अपने जीवन और अपनी चिंताओं में ही पिछले 35 वर्ष व्यतीत कर दिए होते, तो शायद उन “सरकार-जीवी” जनप्रतिनिधियों का समय भी व्यर्थ न होता, जो जनता को डी.के. जोशी के प्रयासों के विरुद्ध भड़काने में लगे रहते हैं। और भोली-भाली जनता भी उनके प्रभाव में आ जाती है। अन्यथा बंदरों की समस्या, शराब से बर्बादी, आवारा गाय-बैलों से फसलों को नुकसान जैसी समस्याओं से मुझ जैसे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता का व्यक्तिगत रूप से क्या संबंध?
यह मेरी “मन की बात” है — केवल आज की नहीं, बल्कि अब तक के पूरे जीवन की बात। भविष्य में मन में क्या आएगा, यह भविष्य ही बताएगा।
— डी.के. जोशी
गरुड़, बागेश्वर
मो. 9319805337