Tarun Bharat Sangh

Tarun Bharat Sangh Tarun Bharat Sangh (TBS) is an NGO working in the semi-arid region of the Rajasthan state of India. TBS is chaired by Sri Rajendra Singh aka Water Man of India.

OBJECTIVES of TBS
• Expansion or restoration of social and cultural values by setting examples in welfare action.
• Finding a balance between human and natural resource development.
• Bringing women forward in the process of decision making.
• Improvement of the level of education in the community.
• Incorporation of better health facilities to create healthy community.
• Energizing human power, e

specially youth power, to harness energy to value-based work with an orientation to rural development and ecology restoration.

*जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, उन्मूलन अध्ययन प्रयोगशाला।*__तरुण आश्रम, भीकमपुरा, अलवर में तरुण ताल की दीवारों पर अपने कार्यो...
12/06/2026

*जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, उन्मूलन अध्ययन प्रयोगशाला।*
__
तरुण आश्रम, भीकमपुरा, अलवर में तरुण ताल की दीवारों पर अपने कार्यों तथा पिछले पाँच दशकों के कार्यों का, दुनिया के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर चित्रण प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण बहुत ही सरल और आसानी से समझ में आने वाला है। अध्ययन के परिणामों पर आधारित ये चित्र पूरी कहानी बताते हैं कि जब तरुण भारत संघ ने यहाँ काम शुरू किया था, तब इस क्षेत्र में व्यापक खनन हो रहा था। खनन के कारण धरती नंगी हो गई थी और नंगी धरती पर सूर्य की तीव्र गर्मी सीधे पड़ती थी। इस गर्मी के कारण स्थिति ऐसी हो गई थी कि बादल ऊपर ही ऊपर निकल जाते थे और बिना बरसे आगे बढ़ जाते थे। उस समय पानी के क्षेत्र में काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि लोग कहते थे कि जब बारिश ही नहीं होती, तो पानी के काम का क्या प्रभाव होगा।
इसके बावजूद तरुण भारत संघ ने पूरे विश्वास के साथ यह कार्य शुरू किया। गोपालपुरा में काम शुरू होने के लगभग तीन वर्ष बाद अच्छी वर्षा होने लगी और फिर लोगों का जल संरक्षण कार्यों की ओर रुझान बढ़ गया। इसी अनुभव को तरुण भारत संघ ने दीवारों पर चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। पहली स्लाइड में दिखाया गया है कि जब सूर्य की गर्मी नंगी धरती पर पड़ती है, तो तापक्रम बढ़ जाता है और वर्षा अच्छी नहीं होती, बादल आगे निकल जाते हैं। दूसरी स्लाइड में दर्शाया गया है कि सूर्य की गर्मी से समुद्र से वाष्पीकरण होता है, जिससे बादल बनते हैं। ये बादल हरियाली वाले क्षेत्रों की ओर जाते हैं और वहाँ वर्षा करते हैं। नियम यह है कि बादलों की गर्मी जंगलों की गर्मी की ओर आकर्षित होती है और दोनों मिलकर वर्षा को संभव बनाते हैं।
हरियाली से उत्पन्न होने वाली नमी और ऊष्मा को अंग्रेज़ी में ट्रांस-इवैपोरेशन (Trans-evaporation) तथा जलाशयों और समुद्रों से होने वाले वाष्पीकरण को इवैपोरेशन (Evaporation) कहा जाता है। जब ट्रांस-इवैपोरेशन और इवैपोरेशन दोनों मिलते हैं, तब अच्छी वर्षा होती है। इसके बाद जल संरचनाओं में पानी एकत्रित होने लगता है और वह धरती का पेट भरता है। यदि धरती में सीधी दरारें हों, तो पानी उन दरारों के माध्यम से धरती के भीतर चला जाता है। एक बार पानी धरती के भीतर पहुँच जाए, तो सूर्य उसे आसानी से नहीं चुरा सकता। यही पानी धीरे-धीरे नदियों, पेड़ों की जड़ों और कुओं तक पहुँचने लगता है।
समय के साथ भूजल स्तर ऊपर आने लगता है और सूखे हुए जल स्रोत फिर से बहने लगते हैं। इस प्रक्रिया में पंद्रह से बीस वर्ष तक का समय लग सकता है, क्योंकि यह भूगोल में परिवर्तन का कार्य है और ऐसे परिवर्तन होने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। यही अनुभव तरुण भारत संघ को अपने कार्यक्षेत्र में प्राप्त हुए। इसके बाद तालाब पानी से भरने लगे, कुएँ भरने लगे और खेती फिर से शुरू हो गई। जो युवा रोजगार की तलाश में गाँव छोड़कर शहर चले गए थे, वे वापस गाँव लौटने लगे और अच्छी खेती करने लगे। गाँवों की लाचारी, बेकारी और बीमारी कम होने लगी तथा हरियाली, संतोष और समृद्धि का वातावरण दिखाई देने लगा।
गाँव की इस समृद्धि ने आगे और अधिक वाष्पीकरण को जन्म दिया। इस वाष्पीकरण से छोटे-छोटे बादल बने, जिन्हें माइक्रो क्लाउड्स कहा जा सकता है, और इसी प्रक्रिया ने एक प्रकार का माइक्रो क्लाइमेट तैयार किया। इन माइक्रो क्लाउड्स ने अन्य बादलों को भी अपनी ओर आकर्षित किया और मिलकर बेहतर वर्षा करने लगे। परिणामस्वरूप क्षेत्र में नियमित और अच्छी वर्षा होने लगी। अब यहाँ नियमित वर्षा होती है तथा दो से तीन फसलें ली जाती हैं। शहरों से गाँवों की ओर लोगों की वापसी ने भी एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन पैदा किया।
इस परिवर्तन को देखकर तरुण भारत संघ के अध्यक्ष ने वर्ष 2009 में यह कहना शुरू किया था कि “जल ही जलवायु है और जलवायु परिवर्तन जल से ही होता है।” ये प्रभाव अध्ययन चित्र भी बताते हैं कि इस प्रकार के प्रभावकारी कार्य न केवल स्थानीय स्तर पर परिवर्तन लाते हैं, बल्कि दुनिया की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं।
वर्ष 2015 में आयोजित कोप-21 (COP-21) सम्मेलन, जिसमें दुनिया भर के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पर्यावरण संबंधी निर्णय लेने के लिए एकत्रित होते हैं, पेरिस में आयोजित हुआ था। यह संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन था, जिसमें हमें भी आमंत्रित किया गया था। हम सामान्यतः ऐसे सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं, लेकिन इस बार विशेष रूप से “Water is Climate and Climate is Water” विषय पर आमंत्रित किया गया था।
पेरिस सम्मेलन में तरुण भारत संघ की ओर से संगठन के निदेशक मोलिक सिसोदिया और अध्यक्ष दोनों शामिल हुए। उन्होंने इस विषय को अत्यंत जिम्मेदारी और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया। सम्मेलन से लगभग एक माह पहले ही इस विचार का प्रभाव पूरे पेरिस और आसपास के देशों में विभिन्न स्थानों पर दिखाई देने लगा था। जब यह बात पर्याप्त रूप से सिद्ध हो गई, तब इसे वैश्विक स्तर पर स्वीकार कराने के लिए दुनिया भर से हजारों लोग एकत्रित हुए। “Water is Climate, Climate is Water” के नारों के साथ यह कहा गया कि यदि इस विचार को स्वीकार नहीं किया गया, तो वे इस निर्णय को स्वीकार नहीं करेंगे। इसका व्यापक प्रभाव पड़ा और अंततः यह विचार नीति का हिस्सा बन गया।
इन चित्रों में यह समझा जा सकता है कि किस प्रकार तापक्रम में परिवर्तन आया, किस प्रकार हरियाली बढ़ी और उस हरियाली ने वातावरण से कार्बन को सोख लिया। कार्बन को सोखने के साथ-साथ ऑक्सीजन का स्तर भी बढ़ा। कार्बन का अवशोषण और ऑक्सीजन की वृद्धि, जलवायु अनुकूलन और जलवायु परिवर्तन के संकटों के स्वाभाविक उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुए।
गाँव के लोग इसे सरल शब्दों में समझाते हैं कि पहले बारिश नहीं होती थी, लेकिन अब नियमित रूप से होती है। वर्षा का यह नियमित होना किसानों के मन में इस बात को स्थापित करता है कि जल संरक्षण और हरियाली का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। यह अनुभव यह भी सिद्ध करता है कि लोग जलवायु परिवर्तन को किस प्रकार देखते और समझते हैं, तथा लोकविद्या के माध्यम से जलवायु परिवर्तन की व्याख्या कैसे की जा सकती है।

इस प्रभाव का दुनिया के कई वैज्ञानिकों, किसानों और पर्यावरण के कार्यकर्ताओं ने अध्ययन किया था। भारत की संस्थानों , संयुक्त राष्ट्र संघ की यूएनडीपी व वर्ल्ड बैंक, के ने यह अध्ययन करवाया था। स्वीडन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने भी इस अध्ययन करके फिलो नाम की पुस्तक निकाली थी। संयुक्त राष्ट्र संघ ने बेस्ट प्रॉक्टिक्स के नाम से इस अध्ययन की पुस्तक निकाली थी। भारत सरकार के कपार्ट ने भी कई पुस्तके प्रकाशित की। इस प्रभाव का 51 वर्षों में बहुत ही प्रभावशाली अध्ययन हुआ।
तरुण भारत ने सभी प्रभावों का अध्ययन एकत्रित करके यह भित्ती चित्र बनाया है। इस चित्र में 10 स्लाइड है, जो पूरे 51 वर्ष के प्रभाव की कहानी बता देती है।
तरुण भारत संघ ने अपने कार्यक्षेत्र में इस लोकशिक्षा को सफलतापूर्वक स्थापित किया है। इसलिए ये चित्र जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और उन्मूलन से जुड़े एक समय-सिद्ध, अनुभव-आधारित और शोध-सत्य को प्रस्तुत करते हैं।

विश्व जल तीर्थ: जल प्रयोगशाला___तरुण भारत संघ ने जब जल संरक्षण का काम शुरू किया था, उसी काल में तरुण भारत संघ परिसर में ...
10/06/2026

विश्व जल तीर्थ: जल प्रयोगशाला___
तरुण भारत संघ ने जब जल संरक्षण का काम शुरू किया था, उसी काल में तरुण भारत संघ परिसर में गायों को पानी पिलाने के लिए एक छोटा सा तालाब बनाया था। उस तालाब को गहरा करते-करते बहुत सारी आश्चर्यचकित करने वाली भू-बनावटों और भू-संरचनाओं का दर्शन हुआ। तरुण भारत संघ भी अपने जल प्रशिक्षण से जुड़े विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने के लिए धीरे-धीरे इस प्रयोगशाला में नए-नए खोज और नए-नए तरीके के काम करता रहा।
अब परिणाम यह है कि तरुण आश्रम, भीकमपुरा में तरुण भारत संघ के मित्रों, साथियों और शुभचिंतकों द्वारा तैयार की गई इस जल संरचना में भू-आकृति और भू-बनावट को समझने का बहुत ही सुंदर, परिमार्जित और प्राकृतिक स्वरूप दिखाई देता है। जहाँ कहीं अधिक पढ़े-लिखे लोग इन चीजों में विचलित हो जाते हैं कि कोई प्राकृतिक प्रयोगशाला कैसे हो सकती है, क्योंकि उनकी प्रयोगशालाएँ तो कृत्रिम ही होती हैं; लेकिन यह भूजल संरक्षण के लिए विश्व स्तर की अद्भुत प्रयोगशाला बन गई है, जहाँ दुनिया भर के राजनेता, अधिकारी और व्यापारी आकर प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं।
तरुण भारत संघ की यह प्रयोगशाला अभी तक दुनिया के मंत्रियों, अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों सभी को यह सिखाने में सफल हुई है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से होने वाले काम प्रकृति से इंसान को दूर ले जाते हैं, लेकिन लोकभाव विद्या और लोक-बुद्धिमत्ता से होने वाले काम इंसान को प्रकृति के साथ जोड़कर रखते हैं। जब इंसान प्रकृति के साथ जुड़कर अपने आप को देखता है, तब वह प्रकृति से सीखने के लिए रास्ते भी खोज लेता है।
यह प्रयोगशाला मेरे जीवन में 80 के दशक में काम की सीख के लिए शुरू हुई और मुझे धरती के अंदर की बनावट तथा धरती के ऊपर की प्राकृतिक वनस्पतियों से सीखने और सीख देने में सफल सिद्ध हुई। इस प्रयोगशाला में जब हम पूर्व दिशा की ओर मुँह करके खड़े होते हैं, तो बाईं तरफ उत्तर दिशा में केवल काँटेदार पेड़ दिखाई देते हैं, क्योंकि उस तरफ धरती में जो दरारें हैं, वे समतल दरारें हैं। दक्षिण दिशा में धरती के अंदर सीधी जाने वाली दरारें हैं। इसलिए जहाँ धरती के अंदर जाने वाली दरारें हैं, उस तरफ हरे-भरे, लंबे और पत्तियों वाले पेड़ हैं।
चालीस वर्षों में यह अनुभव और गहरा होता गया, क्योंकि हमारी आँखों के सामने ही इस प्रयोगशाला की प्राकृतिक निर्माण प्रक्रिया विकसित हुई। हमने देखा कि जिस तरफ पत्थर में दरारें नहीं हैं, या नीचे की तरफ जाने वाली दरारें नहीं हैं, उस तरफ कोई पेड़ नहीं होते। यदि होते भी हैं, तो काँटेदार होते हैं, पत्तियों वाले नहीं। और जिस तरफ धरती में दरारें नीचे तक जाती हैं, उस तरफ पत्तियों वाले, लंबे और हरे-भरे पेड़ होते हैं। यह अंतर दिन-ब-दिन और स्पष्ट होता गया तथा अनुभव बनकर अनूभूति को मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।
प्रकृति सबसे बड़ी गुरु है। प्रकृति से मिलने वाली विद्या जीवन को विखंडित नहीं करती, बल्कि जोड़ती है। जीवन को जोड़ने वाली यह विद्या प्राकृतिक लोकभाव विद्या में विद्यमान है। यह बात इस प्रयोगशाला की निर्माण प्रक्रिया में सिद्ध हुई।
इस प्रयोगशाला में सीखने के लिए आज भी कई युवा विदेशों से आते हैं, जिनमें से एक नाम डॉ. नितिन है। ऐसे ही प्रतिदिन लोग इस प्रयोगशाला में भ्रमण करते हैं। इस प्रयोगशाला में सीखने के लिए किसी प्रशिक्षक की आवश्यकता नहीं होती। जो स्वयं प्रकृति के साथ जुड़कर देखना और सीखना चाहते हैं, वे इस प्रयोगशाला में भ्रमण करके जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, वर्षा जल के वाष्पीकरण को रोकने तथा वर्षा जल से जल उपयोग दक्षता बढ़ाने की सहज सीख प्राप्त कर लेते हैं।
यह प्रयोगशाला एक ही स्थान पर दुनिया की विविध प्रकार की भू-आकृतियों और भू-संस्कृतियों को सिखाने में सक्षम है। इसमें विविध प्रकार की चट्टानें, मिट्टियाँ तथा चट्टानों के बीच की दरारों का दर्शन होता है। भूजल संरक्षण की आकृति, जिसे अंग्रेज़ी में *Aquifer* कहते हैं, वह भी इसमें स्वतः ही दिखाई दे जाती है।
इस प्रयोगशाला में एक साथ 500 व्यक्ति विभिन्न कोनों पर खड़े होकर सीख सकते हैं, देख सकते हैं, और एक व्यक्ति भी इसे स्वतंत्र रूप से देख-समझ सकता है। यह प्रयोग करके सीखने की सहज जगह है।
किस प्रकार की मिट्टी में कितना घनत्व होता है, किस मिट्टी में कितना जल सोखने की शक्ति होती हैयहाँ विभिन्न प्रकार की मिट्टियों पर प्रयोग करके देखा और सिद्ध किया गया है। नए लोग भी यहाँ प्रयोग करके इसे देख और सिद्ध कर सकते हैं।
कौन-सी मिट्टी की कितनी क्षमता होती है? किस मिट्टी की जल-धारण क्षमता कितनी है? यह सब यहाँ अलग-अलग प्रकार की मिट्टियों में देखा और समझा जा सकता है।
इस प्रयोगशाला को हमने प्रारंभ में प्रयोगशाला की तरह नहीं, बल्कि प्रकृति की व्यवस्था से सीखने के लिए बनाया था। फिर यह धीरे-धीरे एक व्यापक वैश्विक प्रयोगशाला बनती गई।
तरुण भारत संघ का सदैव यह प्रयास रहा है कि वह जो भी काम करे, लोगों से सीखकर और लोगों के लिए जो उत्तम हो सकता है, वही विधि अपनाए। तरुण भारत संघ ने अरावली को बचाने और उसे पुनर्जीवित करने का जो भी कार्य किया, उसके पीछे इस वैश्विक जल प्रयोगशाला की सीख है। क्योंकि इस प्रयोगशाला में अरावली क्षेत्र की भू-आकृतियाँ, भू-बनावट और भू-संरचना को देखने और समझने का अवसर मिलता है।
इस प्रयोगशाला में राष्टपति भवन से लेकर, ठेठ गांव की ढ़ाडियों में रहने वाले लोगों को प्रशिक्षित किया है। राष्टपति के.एन. नारायण ने प्रयोगशाला में तैयार हुए काम को देखा था; इसलिए इस प्रयोगशाला की सीखने वालों में इरान, इथोपिया, अफ्रीका, सोमालिया, केन्या आदि देशों में जल संरक्षण के काम किए है। यह प्रयोगशाला सैंकडों देशों के लोगों को समय-समय पर प्रशिक्षित करती रही है, फिर उन लोगों ने अपने देश में पहुंचकर काम किया है।
इसलिए यह प्रयोगशाला अनुभवों की अनुभूति के आधार पर निर्मित हुई है। अनुभवों की अनुभूति से यह समझ विकसित हुई कि जल का रक्षण और संरक्षण करके, मिट्टी में नमी बढ़ाकर, हरियाली बढ़ाकर तथा हरियाली के माध्यम से वातावरण में O₂ का स्तर बढ़ाने के क्या परिणाम होते हैं। यह सब यहाँ सीखने और करने का एक अच्छा अवसर रहा है।

**तरुण वैश्विक चित्र दीर्घा, भीकमपुरा**तरुण भारत संघ ने अपने तरुण आश्रम में विश्व उत्पत्ति, ब्रह्मांड सृष्टि के सृजन, दश...
10/06/2026

**तरुण वैश्विक चित्र दीर्घा, भीकमपुरा**

तरुण भारत संघ ने अपने तरुण आश्रम में विश्व उत्पत्ति, ब्रह्मांड सृष्टि के सृजन, दशावतार तथा भारत की समस्त सांस्कृतिक विरासत को पत्थरों पर चित्रों के माध्यम से उकेरने का कार्य किया है। साथ ही, विश्व के प्रमुख वैज्ञानिकों, भारत के सभी राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों तथा सांस्कृतिक और सामाजिक नेतृत्व प्रदान करने वाले व्यक्तियों के चित्र भी तरुण आश्रम की वैश्विक चित्र दीर्घा में स्थापित हैं।

इस चित्र दीर्घा में विशेष रूप से उन सामाजिक कार्यकर्ताओं के चित्र भी मौजूद हैं जिन्होंने समाज में संस्कृति और प्रकृति के समन्वय से कार्य किया है। देशभर के अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ प्रकृति एवं संस्कृति के संरक्षण हेतु कार्य करने वाले पर्यावरण प्रेमियों तथा विश्व के विभिन्न तीर्थों को बचाने और प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण में योगदान देने वाले व्यक्तियों के चित्र भी पत्थरों पर उकेरे गए हैं।

यह वैश्विक चित्र दीर्घा तरुण भारत संघ ने अपने खेतों से निकले बड़े-बड़े पत्थरों पर बनाई है। यदि इन पत्थरों को निकालकर कहीं एक स्थान पर एकत्रित किया जाता, तो काफी भूमि अनुपयोगी हो जाती। इसलिए उपयुक्त समय पर इन पत्थरों को तरुण ताल के चारों ओर सात पंक्तियों में व्यवस्थित रूप से स्थापित किया गया। सबसे ऊपरी पंक्ति से लेकर नीचे की क्रमिक पंक्तियों तक इन चित्रों को उकेरा गया है। ये चित्र सामाजिक कार्यकर्ताओं को समाज सेवा की प्रेरणा देते हैं तथा पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं को प्रकृति संरक्षण के लिए कार्य करने हेतु उत्साहित करते हैं।

तरुण भारत संघ के परिसर में इन चित्रों को उकेरने का उद्देश्य यह भी है कि संस्था ने अपने पिछले 51 वर्षों के कार्यकाल में संस्कृति और प्रकृति के समन्वय से प्राकृतिक पुनर्जन्म का कार्य किया है। तरुण भारत संघ के प्रयासों ने विशेष रूप से अरावली पर्वतमाला के पुनर्जीवन का एक वैश्विक उदाहरण प्रस्तुत किया है। एक ओर संस्था ने भारत के उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर अरावली के संरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके परिणामस्वरूप 7 मई 1992 को महत्वपूर्ण संरक्षणात्मक निर्णय सामने आया। दूसरी ओर, अवैध खनन को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर चेतना यात्राओं और जनजागरण अभियानों के माध्यम से संरक्षण का कार्य किया गया।

चित्र दीर्घा की पृष्ठभूमि में प्रकृति की ध्वनियाँ, विशेषकर हवा की आवाज़, प्रकृति और संस्कृति के योग एवं संयोग का संदेश देती हैं। जल से मिट्टी बनी, मिट्टी से जीव-जंतु उत्पन्न हुए, फिर पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ विकसित हुईं। इनके जीवन संचालन के लिए वायु, सूर्य की ऊर्जा और आकाश जैसे पंचमहाभूत आवश्यक बने। भारतीय परंपरा में इन पंचमहाभूतों के समन्वय को ही ईश्वर का स्वरूप माना गया है। इसी शक्ति ने मानव को जीवन जीने की कला प्रदान की, जिसे इन चित्रों में विविध रूपों में देखा और समझा जा सकता है। पंचमहाभूतों से निर्मित समस्त प्रकृति, मानव जीवन, भारतीय ज्ञान परंपरा, कालचक्र और देशकाल की अवधारणाओं को भी इस चित्र दीर्घा में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है।

चित्र दीर्घा को देखने के लिए प्रतिदिन स्कूली बच्चे, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद् तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग आते हैं। यहाँ आकर वे समझते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करने वाले लोगों और उसका शोषण करने वाले लोगों में कितना अंतर है। प्रकृति का पोषण करने वाले व्यक्तियों के चित्र इस दीर्घा में बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं, जबकि प्रकृति का शोषण करने वाले लोगों के चित्र इसमें नहीं बनाए गए हैं। यद्यपि ऐसे लोगों के चित्र बनाने पर विचार किया गया है, परंतु अभी तक उन्हें शामिल नहीं किया गया है।

प्रकृति सबका सृजन करती है, जबकि उसका विनाश करने वाला व्यक्ति अपनी स्वार्थपूर्ण गतिविधियों से प्रकृति को क्षति पहुँचाकर अधिक लाभ अर्जित करने का प्रयास करता है। इसलिए इस चित्र दीर्घा में लाभ कमाने वालों के नहीं, बल्कि लोककल्याण और शुभ कार्यों में योगदान देने वाले लोगों के चित्र स्थापित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, धरती पर विद्यमान विभिन्न धर्मों में जल के महत्व को दर्शाने वाले विचार भी भूमि से निकले पत्थरों पर अंकित किए गए हैं।

इस दीर्घा के सभी चित्र तरुण भारत संघ की भूमि से प्राप्त बड़े और छोटे पत्थरों पर ही उकेरे गए हैं। पिछले 51 वर्षों में जिन ग्रामीण महिलाओं, पुरुषों और कार्यकर्ताओं ने तरुण भारत संघ के साथ मिलकर जल संरक्षण और जल प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए, उनके चित्र भी यहाँ स्थापित हैं। संस्था के प्रारंभिक दौर के कार्यकर्ताओं को भी इस दीर्घा में सम्मानपूर्वक स्थान दिया गया है।

इस प्रकार यह चित्र दीर्घा वास्तव में वैश्विक स्वरूप ग्रहण कर चुकी है, क्योंकि इसमें उन्हीं व्यक्तियों के चित्र हैं जिन्होंने प्रकृति के पोषण, संरक्षण और संवर्धन में योगदान दिया है। इसलिए यह प्रकृति और संस्कृति की पोषक एक वैश्विक चित्र दीर्घा है। इस चित्र दीर्घा में सभी धर्मों में जल के बारे जो व्याख्या की गई,उसे भी दर्शाया गया है। जो इस प्रकार है - हिन्दू धर्म- ‘‘आपोः देवताः। जल जीवन है। यही जीविका और अध्यात्म है। सभी को सब कुछ देने वाला यही नारायण है। यही सृष्टि का सर्जन और संहार करने वाली षक्ति है।‘‘
इस्लाम धर्म-‘‘जल खुदा का रहमोकरम है। यह पाक-पवित्र है। यही मानवीय षरीर को पाक रखता है।’’
सिक्ख धर्म-‘‘पाणी पिता, धरती माता, वायु गुरु है।‘‘
ईसाई धर्म-‘‘जल सभी को भरता है। जैसे कि भक्ति में लीन भक्तों को परमात्मा भरता है।’’ जल हमारी षारीरिक जरूरतों के लिए महत्त्वपूर्ण है, उसी प्रकार परमात्मा हमारी आध्यात्मिक आवष्यकता है।’’
बहाई धर्म-‘‘जल का इस्तेमाल भगवान की मर्जी के खिलाफ होगा तो मनुष्य ऐसी प्यास का षिकार हो जाएगा,...जिसे समुद्र भी नहीं बुझा सकता।‘‘
बौद्ध धर्म-‘‘परलोक में जाने वाले प्राणी को जल से पूर्ण तृप्ति प्राप्त होती है।‘‘
यहूदी धर्म-‘‘पानी खुदा का ऐसा षस्त्र है, जो किसी के लिए वरदान और किसी के लिए श्राप बन सकता है।’’
षिन्टो धर्म-‘‘ प्राकृतिक, प्रत्येक अंग पूजनीय है। जल प्रकृति के निर्माण का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है।’’
पारसी धर्म-‘‘जल, अग्नि और धरती पवित्र हैं। इनकी पवित्रता बचाना ही धर्म है।’’

इस लेख को पढ़ने वाले सभी मित्रों और साथियों से आग्रह है कि वे इस वैश्विक चित्र दीर्घा को देखने अवश्य आएँ। यह चित्र दीर्घा तरुण आश्रम, भीकमपुरा,थानागाजी अलवर राजस्थान में है। इन दिनों गर्मी थोड़ी अधिक है, ऐसे में 15 अगस्त से लेकर 15मार्च तक का समय सबसे उत्तम है। आपको जब अनुकूल लगे; जरूर आएं।

तरुण तुलसी बाग, भीकमपुरा**---कोविड काल में Tarun Bharat Sangh ने तुलसी के करोड़ों पौधे तैयार किए। इन पौधों को तरुण आश्रम...
08/06/2026

तरुण तुलसी बाग, भीकमपुरा**
---
कोविड काल में Tarun Bharat Sangh ने तुलसी के करोड़ों पौधे तैयार किए। इन पौधों को तरुण आश्रम परिसर के सभी मार्गों के किनारे लगाया गया तथा अनेक छोटे-छोटे तुलसी बाग विकसित किए गए। उसी समय यहां बड़े पैमाने पर तुलसी के बीज तैयार करके आसपास के गांवों और क्षेत्रों में वितरित किए गए। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे क्षेत्र में, विशेषकर मेवात में, बड़ी संख्या में लोगों के घरों में तुलसी के पौधे लगाए गए। यहां तक कि मुस्लिम परिवारों के घरों में भी तुलसी के पौधे दिखाई देने लगे। यह सब तरुण भारत संघ के व्यापक जनसंपर्क और प्रकृति संरक्षण के कार्यों का परिणाम था।
तरुण भारत संघ ने अपने परिसर में जहां-जहां भी थोड़ी सी जगह उपलब्ध हुई, वहां तुलसी का रोपण किया। इसका प्रभाव यह रहा कि तरुण आश्रम का वातावरण अत्यंत स्वास्थ्यवर्धक और स्वच्छ बना रहा। कोविड महामारी के कठिन समय में भी आश्रम परिसर में किसी को कोविड संक्रमण नहीं हुआ। इसके साथ ही तरुण भारत संघ ने महामारी के दौरान अनेक स्थानों पर दवाइयों, ऑक्सीजन सिलेंडरों, चिकित्सा उपकरणों और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता में भी महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।
कोविड काल समाप्त होने के बाद भी तुलसी बाग का यह अभियान निरंतर जारी रहा। वर्तमान में भी तरुण भारत संघ परिसर में छोटे-बड़े मिलाकर 11 तुलसी बाग विकसित हैं। इनमें विभिन्न प्रजातियों की तुलसी जैसे श्यामा तुलसी, रामा तुलसी तथा अन्य देशी किस्मों के अलग-अलग बाग शामिल हैं। जून की प्रचंड गर्मी में भी ये तुलसी बाग उतने ही हरे-भरे दिखाई देते हैं, जैसे वर्षा ऋतु में दिखाई देते हैं।
आश्रम में तुलसी के पत्तों से चाय और काढ़ा तैयार किया जाता है तथा उनका उपयोग स्वास्थ्य संवर्धन के लिए किया जाता है। किंतु इनका व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जाता। तुलसी के पत्तों को एकत्र कर बाजार में बेचने का प्रयास नहीं किया गया, क्योंकि इसके लिए श्रम की लागत अधिक है और उचित बाजार भी उपलब्ध नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम तुलसी को “माई” मानते हैं, इसलिए उससे कमाई करना नहीं चाहते। इसी कारण हमने तुलसी का **बाजार नहीं, बाग** बनाया है।
भारतीय परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण तुलसी के बाग को **वृंदावन** कहते हैं। तरुण भारत संघ परिसर में ऐसे अनेक वृंदावन विकसित किए गए हैं। इनका उद्देश्य समाज में सुख, शांति और स्वास्थ्य का संवर्धन करना है, न कि व्यापार करना। तुलसी के ये बाग जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन में सहायक हैं, वातावरण को शुद्ध करते हैं और प्राणवायु की मात्रा बढ़ाने में योगदान देते हैं। यही कारण है कि तरुण भारत संघ ने तुलसी के बागों के विकास को अपने महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कार्यों में शामिल किया है।
इन तुलसी बागों को पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से विकसित किया जा रहा है। इनमें अत्यधिक मजदूरी या कृत्रिम प्रबंधन की आवश्यकता नहीं पड़ती। अधिकांश कार्य श्रमदान के माध्यम से संचालित होते हैं। यही कारण है कि आज जब जून माह में चारों ओर भीषण गर्मी पड़ रही है, तब भी तरुण आश्रम का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में लगभग चार डिग्री सेल्सियस कम अनुभव होता है। यह हरियाली, जल संरक्षण और तुलसी बागों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है।
तरुण भारत संघ सभी प्रकृति प्रेमियों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को आमंत्रित करता है कि वे तरुण आश्रम, भीकमपुरा आएं, इन तुलसी बागों का भ्रमण करें और इनके महत्व को समझें। जो लोग अपने गांव, मोहल्ले, विद्यालय, संस्थान या घर में तुलसी का बाग विकसित करना चाहते हैं, वे यहां से तुलसी के पौधे और बीज प्राप्त कर सकते हैं।
तरुण भारत संघ तुलसी से किसी प्रकार का आर्थिक लाभ कमाना नहीं चाहता। इसलिए तुलसी बाग लगाने के इच्छुक लोगों को पौधे और बीज **निःशुल्क** उपलब्ध कराए जाते हैं। आइए, तरुण आश्रम भीकमपुरा पहुंचिए, तुलसी के पौधे और बीज प्राप्त करिए तथा अपने क्षेत्र में भी एक नया वृंदावन विकसित करने का संकल्प लीजिए।
S

’’तरुण गौ सेवा, भीकमपुरा’’तरुण भारत संघ ने तरुण आश्रम, भीकमपुरा, अलवर राजस्थान में वर्ष 1986 में गौशाला स्थापित की थी। अ...
07/06/2026

’’तरुण गौ सेवा, भीकमपुरा’’

तरुण भारत संघ ने तरुण आश्रम, भीकमपुरा, अलवर राजस्थान में वर्ष 1986 में गौशाला स्थापित की थी। अब यह गौशाला केवल देसी गायों की विविध नस्लों की गोसेवा का केंद्र है। इस गोसेवा में हरियाणवी, थारपारकर तथा अन्य देसी नस्ल की गायें हैं।
तरुण आश्रम के परिसर में गर्मियों में जो फसलें उगाई जाती हैं, उनमें अधिकांश चारा गायों के लिए ही उगाया जाता है। फरवरी या मार्च में रबी की फसल कटते ही बाजरा, ज्वार, मक्का एवं ढैंचा बो दिया जाता है। अप्रैल, मई, जून और जुलाई के चार महीनों तक इन चारा फसलों को अलग-अलग खंडों में चराई के लिए खोला जाता है। गायें इसी हरे चारे पर चरती हैं। इस चराई से दूध की गुणवत्ता भी अच्छी रहती है और गायें स्वस्थ रहती हैं।
आज 7 जून के दिन भी गायें हरे चारे में मन भरकर चर रही हैं। वर्तमान में इस गौशाला में कुल 15 गायें, 9 छोटी बछिया-बछड़ियाँ तथा 4 सांड हैं। जो बछड़े होते हैं, उन्हें सांड के रूप में विकसित किया जाता है और जो बछिया होती हैं, वे आगे चलकर गाय बनती हैं। इस प्रकार तरुण गोसेवा का कार्य निरंतर और समृद्ध रूप से संचालित हो रहा है।
इस तरुण गौ सेवा में भीकमपुरा के लाला मीना तथा बामनवास के संदीप पांचाल नित्य रूप से गायों की सेवा करते हैं। वैसे तो तरुण भारत संघ के अध्यक्ष से लेकर सभी कार्यकर्ता गोसेवा को अपना कार्य मानते हैं। इसलिए ये गायें एक प्रकार से तरुण परिवार का ही हिस्सा हैं और परिवार के सदस्य की तरह रहती हैं।
तरुण गौ सेवा में आज तक कभी दूध बेचा नहीं गया। जो दूध प्राप्त होता है, उसका उपयोग आश्रमवासी स्वयं करते हैं। उससे घी और छाछ भी बनाई जाती है। इस प्रकार यह गौशाला स्वावलंबी गौशाला है।
गायों के गोबर तथा आश्रम में उत्पन्न पत्तों और फसलों के बचे हुए चारे को खड्डों में डाला जाता है। उसमें गोबर का घोल अथवा गोबर गैस संयंत्र से निकलने वाला अवशेष डाला जाता है और फिर उसके ऊपर मिट्टी की परत बिछा दी जाती है। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। खड्डा भर जाने पर उसे पलट दिया जाता है। आजकल यह कार्य मशीन (जेसीबी) से किया जाता है, जबकि पहले इसे हाथों से पलटा जाता था। अब अधिकांश कार्य मशीनों की सहायता से किया जाता है। इसके साथ ही तरुण भारत संघ के समस्त कार्यकर्ता श्रमदान करके, प्रकृति को समृद्ध बनाने का कार्य करते रहते है।

 #विश्व_पर्यावरण_दिवस के अवसर पर जल आकांक्षी क्षेत्र धौलपुर एवं करौली में ग्रामीणों के साथ पर्यावरण एवं जल संरक्षण को ले...
06/06/2026

#विश्व_पर्यावरण_दिवस के अवसर पर जल आकांक्षी क्षेत्र धौलपुर एवं करौली में ग्रामीणों के साथ पर्यावरण एवं जल संरक्षण को लेकर विशेष बैठकों का आयोजन किया गया।

इस दौरान ग्रामीणों के साथ जल संरक्षण के महत्व, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग तथा पर्यावरण संरक्षण में सामुदायिक सहभागिता की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न जल संरचनाओं के आसपास पौधारोपण भी किया गया, जिससे जल स्रोतों का संरक्षण हो सके और क्षेत्र में हरित आवरण को बढ़ावा मिले। ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए पौधों की देखभाल एवं संरक्षण का संकल्प लिया।

सभी उपस्थित ग्रामीणों ने एक स्वर में यह संकल्प लिया कि प्रकृति का संरक्षण हमारा नैतिक एवं सामाजिक दायित्व है। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास करते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, हरित और सुरक्षित पर्यावरण का निर्माण करेंगे।

LIC Housing Finance Limited| HCLFoundation

 #विश्व_पर्यावरण_दिवस पर संकल्प: पानी बचाओ –जीवन बचाओ।प्रकृति संरक्षण-हमारा कर्तव्य है।
05/06/2026

#विश्व_पर्यावरण_दिवस पर संकल्प:

पानी बचाओ –जीवन बचाओ।
प्रकृति संरक्षण-हमारा कर्तव्य है।

जल आंकाक्षी क्षेत्र धौलपुर में जल संरक्षण कार्य लगातार जारी है। अभी Tarun Bharat Sangh द्वारा LIC Housing Finance Limite...
03/06/2026

जल आंकाक्षी क्षेत्र धौलपुर में जल संरक्षण कार्य लगातार जारी है। अभी Tarun Bharat Sangh द्वारा LIC Housing Finance Limited के सहयोग से "घाट का तालाब" का निर्माण कार्य चल रहा है। इसमे अभी तालाब की पाल का कार्ये किया जा रहा है।



इस #तालाब के बन जाने से आस-पास की जैवविविधता संपन्न होगी और भूजल पुनर्भरण भी बड़ी मात्रा में होगा।

Tarun Bharat Sangh द्वारा  Card के सहयोग से मरुभूमि जैसलमेर के ग्रामीण क्षेत्र में 'धन सिंह के फार्म पॉण्ड  ’ का निर्माण...
01/06/2026

Tarun Bharat Sangh द्वारा Card के सहयोग से मरुभूमि जैसलमेर के ग्रामीण क्षेत्र में 'धन सिंह के फार्म पॉण्ड ’ का निर्माण कार्य लगातार जारी है।

इससे पशुओं के लिए पीने के पानी की पर्याप्त और सिंचाई के लिए भी जल उपलब्धता सुनिश्चित होगी। मरुभूमि में जल का हर कण अमूल्य है, और ऐसे प्रयास हमें याद दिलाते हैं कि परंपरा, श्रमदान और सामुदायिक भागीदारी से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।



💦 Tarun Bharat Sangh ने पूर्ण किए सेवा और सृजन के 51 वर्ष 💦प्रिय साथियों,आज हम सभी के लिए अत्यंत हर्ष, गर्व और आत्ममंथन ...
30/05/2026

💦 Tarun Bharat Sangh ने पूर्ण किए सेवा और सृजन के 51 वर्ष 💦

प्रिय साथियों,

आज हम सभी के लिए अत्यंत हर्ष, गर्व और आत्ममंथन का अवसर है। प्रकृति, समाज और संस्कृति की सेवा के संकल्प के साथ प्रारंभ हुई हमारी सामूहिक यात्रा ने आज 51 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं।

तरुण भारत संघ का कार्य केवल जल, जंगल और जमीन के संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और संस्कृति के समन्वय से निर्मित एक जनआंदोलन है। यह आंदोलन भारत के देशज ज्ञान, लोकबुद्धि, सामुदायिक सहभागिता और श्रम की शक्ति पर आधारित है। पिछले पाँच दशकों से अधिक समय में लाखों लोगों के सहयोग, स्नेह, विश्वास और समर्पण ने इस यात्रा को निरंतर आगे बढ़ाया है।

मैं इस अवसर पर उन सभी साथियों, ग्रामवासियों, जलयोद्धाओं, सहयोगियों और शुभचिंतकों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिनके योगदान से यह यात्रा संभव हो सकी। यह उपलब्धि किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि उन असंख्य लोगों की सामूहिक साधना का परिणाम है जिन्होंने प्रकृति के पुनर्जीवन को अपना धर्म माना।

पिछले 51 वर्षों में तरुण भारत संघ ने भारत की धरती पर 23 छोटी, सूखी और मृतप्राय नदियों को पुनर्जीवित करने का कार्य किया है। यह केवल नदियों का पुनर्जीवन नहीं है; जब कोई नदी पुनर्जीवित होती है, तो उसके साथ उस क्षेत्र की सभ्यता, संस्कृति, जैव विविधता, आजीविका और सामाजिक जीवन भी पुनर्जीवित हो जाता है। नदी का बहता जल केवल जीवन नहीं देता, वह समाज में आशा, आत्मविश्वास और समृद्धि का भी संचार करता है।

तरुण भारत संघ की 50 वर्षों की प्रेरक यात्रा को समेटने वाली फिल्म “Water of Change” के छह भाग आज आप सभी को सादर समर्पित कर रहा हूँ। आशा है कि ये दस्तावेज़ जल संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी और प्रकृति पुनर्जीवन के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बनेंगे।

आइए, हम सब मिलकर आने वाले वर्षों में नदियों, पहाड़ों, जंगलों और धरती के संरक्षण संवर्धन का संकल्प और अधिक दृढ़ करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, समृद्ध और जीवनदायी प्रकृति विरासत के रूप में मिल सके।

सप्रेम एवं सादर,

राजेंद्र सिंह

*तरुण भारत संघ के 50 वर्षों की गाथा की 6 फिल्म*

1. उद्भव
https://youtu.be/xyTDjwFNKZk?si=0mE8LH9VevGcBeQg

2. हुंकार
https://youtu.be/i0gT4mA5_lc?si=NrOs6PHg5eiVYg8z

3. क्रांति
https://youtu.be/fZIukhmfT5Y?si=536IJX0KD3WIFY8n

4. संकल्प
https://youtu.be/vR0SRYwcot8?si=h3pN29CNGlTZpr6e

5. पुनर्निर्माण
https://youtu.be/rtqhNmTd8ck?si=L9t822WwkRjv9eWW

6. उड़ान
https://youtu.be/X2_4peEpfYg?si=d-K6o5MoQ0EtyHXP

Address

Village: Bheekampura, Tehsil: Thanagazi, Distt: Alwar
Alwar
301022

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Tarun Bharat Sangh posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Tarun Bharat Sangh:

Share