12/06/2026
*जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, उन्मूलन अध्ययन प्रयोगशाला।*
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तरुण आश्रम, भीकमपुरा, अलवर में तरुण ताल की दीवारों पर अपने कार्यों तथा पिछले पाँच दशकों के कार्यों का, दुनिया के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के आधार पर चित्रण प्रस्तुत किया गया है। यह चित्रण बहुत ही सरल और आसानी से समझ में आने वाला है। अध्ययन के परिणामों पर आधारित ये चित्र पूरी कहानी बताते हैं कि जब तरुण भारत संघ ने यहाँ काम शुरू किया था, तब इस क्षेत्र में व्यापक खनन हो रहा था। खनन के कारण धरती नंगी हो गई थी और नंगी धरती पर सूर्य की तीव्र गर्मी सीधे पड़ती थी। इस गर्मी के कारण स्थिति ऐसी हो गई थी कि बादल ऊपर ही ऊपर निकल जाते थे और बिना बरसे आगे बढ़ जाते थे। उस समय पानी के क्षेत्र में काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि लोग कहते थे कि जब बारिश ही नहीं होती, तो पानी के काम का क्या प्रभाव होगा।
इसके बावजूद तरुण भारत संघ ने पूरे विश्वास के साथ यह कार्य शुरू किया। गोपालपुरा में काम शुरू होने के लगभग तीन वर्ष बाद अच्छी वर्षा होने लगी और फिर लोगों का जल संरक्षण कार्यों की ओर रुझान बढ़ गया। इसी अनुभव को तरुण भारत संघ ने दीवारों पर चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। पहली स्लाइड में दिखाया गया है कि जब सूर्य की गर्मी नंगी धरती पर पड़ती है, तो तापक्रम बढ़ जाता है और वर्षा अच्छी नहीं होती, बादल आगे निकल जाते हैं। दूसरी स्लाइड में दर्शाया गया है कि सूर्य की गर्मी से समुद्र से वाष्पीकरण होता है, जिससे बादल बनते हैं। ये बादल हरियाली वाले क्षेत्रों की ओर जाते हैं और वहाँ वर्षा करते हैं। नियम यह है कि बादलों की गर्मी जंगलों की गर्मी की ओर आकर्षित होती है और दोनों मिलकर वर्षा को संभव बनाते हैं।
हरियाली से उत्पन्न होने वाली नमी और ऊष्मा को अंग्रेज़ी में ट्रांस-इवैपोरेशन (Trans-evaporation) तथा जलाशयों और समुद्रों से होने वाले वाष्पीकरण को इवैपोरेशन (Evaporation) कहा जाता है। जब ट्रांस-इवैपोरेशन और इवैपोरेशन दोनों मिलते हैं, तब अच्छी वर्षा होती है। इसके बाद जल संरचनाओं में पानी एकत्रित होने लगता है और वह धरती का पेट भरता है। यदि धरती में सीधी दरारें हों, तो पानी उन दरारों के माध्यम से धरती के भीतर चला जाता है। एक बार पानी धरती के भीतर पहुँच जाए, तो सूर्य उसे आसानी से नहीं चुरा सकता। यही पानी धीरे-धीरे नदियों, पेड़ों की जड़ों और कुओं तक पहुँचने लगता है।
समय के साथ भूजल स्तर ऊपर आने लगता है और सूखे हुए जल स्रोत फिर से बहने लगते हैं। इस प्रक्रिया में पंद्रह से बीस वर्ष तक का समय लग सकता है, क्योंकि यह भूगोल में परिवर्तन का कार्य है और ऐसे परिवर्तन होने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। यही अनुभव तरुण भारत संघ को अपने कार्यक्षेत्र में प्राप्त हुए। इसके बाद तालाब पानी से भरने लगे, कुएँ भरने लगे और खेती फिर से शुरू हो गई। जो युवा रोजगार की तलाश में गाँव छोड़कर शहर चले गए थे, वे वापस गाँव लौटने लगे और अच्छी खेती करने लगे। गाँवों की लाचारी, बेकारी और बीमारी कम होने लगी तथा हरियाली, संतोष और समृद्धि का वातावरण दिखाई देने लगा।
गाँव की इस समृद्धि ने आगे और अधिक वाष्पीकरण को जन्म दिया। इस वाष्पीकरण से छोटे-छोटे बादल बने, जिन्हें माइक्रो क्लाउड्स कहा जा सकता है, और इसी प्रक्रिया ने एक प्रकार का माइक्रो क्लाइमेट तैयार किया। इन माइक्रो क्लाउड्स ने अन्य बादलों को भी अपनी ओर आकर्षित किया और मिलकर बेहतर वर्षा करने लगे। परिणामस्वरूप क्षेत्र में नियमित और अच्छी वर्षा होने लगी। अब यहाँ नियमित वर्षा होती है तथा दो से तीन फसलें ली जाती हैं। शहरों से गाँवों की ओर लोगों की वापसी ने भी एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन पैदा किया।
इस परिवर्तन को देखकर तरुण भारत संघ के अध्यक्ष ने वर्ष 2009 में यह कहना शुरू किया था कि “जल ही जलवायु है और जलवायु परिवर्तन जल से ही होता है।” ये प्रभाव अध्ययन चित्र भी बताते हैं कि इस प्रकार के प्रभावकारी कार्य न केवल स्थानीय स्तर पर परिवर्तन लाते हैं, बल्कि दुनिया की नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं।
वर्ष 2015 में आयोजित कोप-21 (COP-21) सम्मेलन, जिसमें दुनिया भर के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पर्यावरण संबंधी निर्णय लेने के लिए एकत्रित होते हैं, पेरिस में आयोजित हुआ था। यह संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन था, जिसमें हमें भी आमंत्रित किया गया था। हम सामान्यतः ऐसे सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं, लेकिन इस बार विशेष रूप से “Water is Climate and Climate is Water” विषय पर आमंत्रित किया गया था।
पेरिस सम्मेलन में तरुण भारत संघ की ओर से संगठन के निदेशक मोलिक सिसोदिया और अध्यक्ष दोनों शामिल हुए। उन्होंने इस विषय को अत्यंत जिम्मेदारी और स्पष्टता के साथ प्रस्तुत किया। सम्मेलन से लगभग एक माह पहले ही इस विचार का प्रभाव पूरे पेरिस और आसपास के देशों में विभिन्न स्थानों पर दिखाई देने लगा था। जब यह बात पर्याप्त रूप से सिद्ध हो गई, तब इसे वैश्विक स्तर पर स्वीकार कराने के लिए दुनिया भर से हजारों लोग एकत्रित हुए। “Water is Climate, Climate is Water” के नारों के साथ यह कहा गया कि यदि इस विचार को स्वीकार नहीं किया गया, तो वे इस निर्णय को स्वीकार नहीं करेंगे। इसका व्यापक प्रभाव पड़ा और अंततः यह विचार नीति का हिस्सा बन गया।
इन चित्रों में यह समझा जा सकता है कि किस प्रकार तापक्रम में परिवर्तन आया, किस प्रकार हरियाली बढ़ी और उस हरियाली ने वातावरण से कार्बन को सोख लिया। कार्बन को सोखने के साथ-साथ ऑक्सीजन का स्तर भी बढ़ा। कार्बन का अवशोषण और ऑक्सीजन की वृद्धि, जलवायु अनुकूलन और जलवायु परिवर्तन के संकटों के स्वाभाविक उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुए।
गाँव के लोग इसे सरल शब्दों में समझाते हैं कि पहले बारिश नहीं होती थी, लेकिन अब नियमित रूप से होती है। वर्षा का यह नियमित होना किसानों के मन में इस बात को स्थापित करता है कि जल संरक्षण और हरियाली का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। यह अनुभव यह भी सिद्ध करता है कि लोग जलवायु परिवर्तन को किस प्रकार देखते और समझते हैं, तथा लोकविद्या के माध्यम से जलवायु परिवर्तन की व्याख्या कैसे की जा सकती है।
इस प्रभाव का दुनिया के कई वैज्ञानिकों, किसानों और पर्यावरण के कार्यकर्ताओं ने अध्ययन किया था। भारत की संस्थानों , संयुक्त राष्ट्र संघ की यूएनडीपी व वर्ल्ड बैंक, के ने यह अध्ययन करवाया था। स्वीडन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने भी इस अध्ययन करके फिलो नाम की पुस्तक निकाली थी। संयुक्त राष्ट्र संघ ने बेस्ट प्रॉक्टिक्स के नाम से इस अध्ययन की पुस्तक निकाली थी। भारत सरकार के कपार्ट ने भी कई पुस्तके प्रकाशित की। इस प्रभाव का 51 वर्षों में बहुत ही प्रभावशाली अध्ययन हुआ।
तरुण भारत ने सभी प्रभावों का अध्ययन एकत्रित करके यह भित्ती चित्र बनाया है। इस चित्र में 10 स्लाइड है, जो पूरे 51 वर्ष के प्रभाव की कहानी बता देती है।
तरुण भारत संघ ने अपने कार्यक्षेत्र में इस लोकशिक्षा को सफलतापूर्वक स्थापित किया है। इसलिए ये चित्र जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और उन्मूलन से जुड़े एक समय-सिद्ध, अनुभव-आधारित और शोध-सत्य को प्रस्तुत करते हैं।