श्रीकृष्ण भक्ति-साधना

श्रीकृष्ण भक्ति-साधना Shrikrishna, Almighty!

🦚श्रीकृष्ण की भक्ति और साधना🦚
🙏🌹साधनाएँ: करें पूर्ण मनोकामनाएँ!🌹🙏
সাধনা সংস্কৃরি🌹સાધના સંસ્કૃતિ🌹ஆன்மீகப் பண🌹
Daily Spiritual Wisdom | Meditation | Indian Culture💥❤️
Meditation, Ultimate!..

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 57/58 🕉️महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश‍ृङ्गः कृतान्तकृत् ...
08/10/2026

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 57/58 🕉️

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश‍ृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ ५७॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥ ५८॥

~~ प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं महर्षिः: जिन्होंने महान ऋषियों (जैसे कपिल मुनि) का रूप धारण किया या जो वेदों के ज्ञाता हैं, कपिलाचार्यः: कपिल आचार्य, अर्थात जिन्होंने कपिल मुनि के रूप में ज्ञान का उपदेश दिया, कृतज्ञः: जो सब कुछ जानने वाले और किए गए कर्मों (या जीवों के कृत्यों) को याद रखने वाले हैं, मेदिनीपतिः: पृथ्वी (मेदिनी) के स्वामी या रक्षक, त्रिपदः: तीन पदों (लोक) वाले या जिन्होंने तीन पगों से तीनों लोकों को नाप लिया (वामन अवतार), त्रिदशाध्यक्षः: तीनों अवस्थाओं (जागरूक, स्वप्न, सुषुप्ति) या देवताओं के अध्यक्ष, महाश‍ृङ्गः: महान सींग वाले (मत्स्य या वराह अवतार का संकेत), कृतान्तकृत्: प्रलय के समय संहार करने वाले, महावराहो: महान वराह (सूअर) रूप धारण करने वाले भगवान, गोविन्दः: गायों, इंद्रियों और पृथ्वी के रक्षक (कृष्ण/विष्णु), सुषेणः: सुंदर और सुसंस्कृत सेना वाले, कनकाङ्गदी: सोने के बाजूबंद (अंगद) धारण करने वाले, गुह्यः: जो गुह्य (छिपे हुए या हृदय में स्थित) हैं, गभीरो: जिनकी गहराई को मापा नहीं जा सकता (गंभीर), गहनो: अत्यंत सूक्ष्म और समझने में कठिन, गुप्तः: जो साधारण दृष्टि से छिपे हुए हैं, चक्रगदाधरः: हाथ में चक्र और गदा धारण करने वाले।
🌿🌹🌹🌹🙏❤️🙏🌹🌹🌹🌿

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 55/56 🕉️जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ५५॥अजो ...
06/10/2026

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 55/56 🕉️

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥ ५५॥
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ ५६॥

~ प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं जीवो: समस्त जीवित प्राणियों में प्राण रूप से वास करने वाले (जीवनदाता), विनयिता: अपने भक्तों की विनय (नम्रता) को स्वीकार करने वाले और सृष्टि में मर्यादा व नियम स्थापित करने वाले, साक्षी: संसार के सभी अच्छे और बुरे कर्मों को बिना किसी भेदभाव के देखने वाले (परम गवाह), मुकुन्दो (मुकुन्द): अपने भक्तों को मुक्ति (मोक्ष) प्रदान करने वाले, अमितविक्रमः: जिनकी शक्ति, पराक्रम और सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं है (असीम पराक्रमी), अम्भोनिधिर (अम्भोनिधि): समस्त जल राशियों (समुद्रों) के स्वामी, या प्रलय काल में सब कुछ अपने भीतर समा लेने वाले, अनन्तात्मा: जिनका कोई अंत नहीं है, जो देश, काल और वस्तु की सीमाओं से परे अनंत हैं, महोदधिशयो (महोदधिशय): प्रलय के समय क्षीर सागर (महासागर) में शेषनाग की शय्या पर शयन (आराम) करने वाले, अन्तकः: प्रलय काल में समस्त सृष्टि का अंत (संहार) करने वाले, अजो (अज): जो अजन्मा हैं, जिनका न कभी जन्म हुआ है और न कभी मृत्यु होती है, महार्हः: परम पूजनीय, जो सभी प्रकार की पूजा और आहुतियों के वास्तविक अधिकारी हैं, स्वाभाव्यो (स्वाभाव्य): जो स्वतः सिद्ध हैं, जिन्हें किसी ने बनाया नहीं है और जो हमेशा अपने दिव्य स्वरूप में स्थित रहते हैं, जितामित्रः: जिन्होंने अपने सभी शत्रुओं (और भक्तों के आंतरिक शत्रुओं जैसे काम, क्रोध, लोभ) को पूरी तरह जीत लिया है, प्रमोदनः: अपने ध्यान और स्मरण से भक्तों को परम आनंद (प्रसन्नता) प्रदान करने वाले।
~~ बारम्बार प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं अजः (अजो): जो जन्मरहित है, जिनका कभी जन्म नहीं होता, महार्हः: जो पूजा या अर्चना के सबसे अधिक योग्य और महान हैं, स्वाभाव्यः: जो अपने ही स्वभाव में स्थित हैं, जिन्हें किसी अन्य के सहारे की आवश्यकता नहीं है, जितामित्रः: जिन्होंने काम, क्रोध जैसे आंतरिक शत्रुओं और दुष्टों जैसे बाहरी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की है, प्रमोदनः: जो सबको असीम आनंद और प्रसन्नता प्रदान करते हैं, आनन्दः: जो स्वयं परमानंद के साक्षात स्वरूप हैं, नन्दनः: जो अपने भक्तों के हृदयों को आनंदित करते हैं, नन्दः: जो स्वयं आनंद के मूल स्रोत और परिपूर्ण हैं, सत्यधर्मा: जिनका स्वरूप सत्य और सनातन धर्म है, त्रिविक्रमः: जिन्होंने तीन पग (पैर) से तीनों लोकों को नाप लिया था (वामन अवतार)।
🌹🌹🌹🌿🙏❤️🙏🌿🌹🌹🌹

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 53/54 🕉️उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः॥ ५३॥सो...
06/10/2026

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 53/54 🕉️

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः॥ ५३॥
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः॥ ५४॥

~ प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं उत्तरः (Uttarah): जन्म-मरण के संसार-चक्र से पार उतारने वाले या सबसे श्रेष्ठ, गोपतिः (Gopatih): वेदवाणी (ज्ञान) के स्वामी या पृथ्वी/गौओं के पालनकर्ता (श्रीकृष्ण), गोप्ता (Gopta): समस्त ब्रह्मांड और जीवों की रक्षा करने वाले (रक्षक), ज्ञानगम्यः (Jnana-gamyah): जिन्हें केवल सच्चे ज्ञान, भक्ति और ध्यान के द्वारा ही जाना जा सकता है, पुरातनः (Puratanah): जो समय से भी परे हैं, सनातन हैं और जिनका कोई आदि (शुरुआत) नहीं है, शरीरभूतभृत् (Sharira-bhutabhrit): जीवों के शरीरों को धारण करने वाले और उनका पोषण करने वाले, भोक्ता (Bhokta): सृष्टि के सभी रसों, यज्ञ की आहुतियों और भक्तों के प्रेम को ग्रहण करने (भोगने) वाले, कपीन्द्रः (Kapindrah): वानरों के राजा (सुग्रीव या हनुमान जी) के रूप में लीला करने वाले या वराह अवतार के स्वामी, भूरिदक्षिणः (Bhuri-dakshinah): अपने भक्तों को प्रचुर मात्रा में वरदान, कृपा और दक्षिणा देने वाले।

बारम्बार प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं सोमपः (Somapah): यज्ञों में सोमरस का पान करने वाले (देवताओं के रूप में), अमृतपः (Amritapah): समुद्र मंथन से निकले अमृत की रक्षा और उसका पान करने वाले, सोमः (Somah): चंद्रमा के समान शीतलता प्रदान करने वाले या स्वयं चंद्रमा रूप, पुरुजित् (Purujit): बहुत से शत्रुओं या संसार को पूरी तरह से जीतने वाले, पुरुसत्तमः (Purusattamah): पुरुषों में सबसे उत्तम, श्रेष्ठ और महान (पुरुषोत्तम), विनयः (Vinayah): दुष्टों का दमन करके न्याय और विनय (नम्रता) की स्थापना करने वाले, जयः (Jayah): सर्वविजेता, जिन्हें कोई हरा नहीं सकता, सत्यसन्धः (Satya-sandhah): सत्य का संकल्प रखने वाले, जो अपने वचन को हमेशा पूरा करते हैं, दाशार्हः (Dasharhah): दाशार्ह (यदुवंश) में जन्म लेने वाले (भगवान कृष्ण), सात्वताम्पतिः (Satvatam-patih): सात्वत (भागवत/वैष्णव) भक्तों के स्वामी और रक्षक।
🌹🌹🌹🌿🙏❤️🙏🌿🌹🌹🌹

परम कल्याणकारी विष्णु सहस्रनाम: 51/52 के गूढार्थ🌹🙏धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्। अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृ...
05/10/2026

परम कल्याणकारी विष्णु सहस्रनाम: 51/52 के गूढार्थ🌹🙏

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः॥ ५१॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः॥ ५२॥

~~ उन भगवान विष्णु को बारम्बार प्रणाम जो हैं धर्मगुप् (Dharmagup): जो धर्म की रक्षा करते हैं, धर्मकृत् (Dharmakrit): जो धर्म का आचरण और उसकी रचना करते हैं, धर्मी (Dharmee): जो स्वयं धर्म के स्वरूप और उसके पालनकर्ता हैं, सत्-असत् (Sat-Asat): जो प्रकट (सत्) और अप्रकट (असत्) दोनों रूपों में विद्यमान हैं, क्षरम्-अक्षरम् (Ksharam-Aksharam): जो नाशवान संसार (क्षर) और अविनाशी परमात्मा (अक्षर) दोनों रूप में हैं, अविज्ञाता (Avijnata): जो भक्तों के दोषों पर ध्यान नहीं देते या अज्ञानी की तरह उन्हें क्षमा कर देते हैं, सहस्रांशुः (Sahasraamshuh): जिनके सूर्य के समान अनगिनत प्रकाशमान और तेजस्वी किरणें (ऊर्जा) हैं, विधाता (Vidhaataa): जो संपूर्ण जगत के रचयिता और नियंत्रक हैं, कृतलक्षणः (Kritalakshanah): जिन्होंने धर्म और साधु पुरुषों के लक्षण निश्चित किए हैं, गभस्तिनेमिः (Gabhastinemih): जो ब्रह्मांड की धुरी हैं और किरणों व सुदर्शन चक्र से सबको नियंत्रित करते हैं, सत्त्वस्थः (Sattvasthah): जो शुद्ध सत्त्वगुण में और भक्तों के हृदय में निवास करते हैं, सिंहः (Simhah): जो दुष्टों का नाश करने वाले और वीरता में सिंह के समान पराक्रमी हैं, भूतमहेश्वरः (Bhutamaheshvarah): जो सभी प्राणियों और तत्वों के महान ईश्वर हैं, आदिदेवः (Adi-Devah): जो सबसे पहले और सभी देवताओं के मूल कारण हैं, महादेवः (Mahadevah): जो देवों के भी देव और सबसे महान हैं, देवेशः (Deveshah): जो सभी देवताओं के स्वामी हैं, देवभृद्गुरुः (Devabhridguruh): जो देवताओं का पोषण और उनकी रक्षा करने वाले (देवभृत्) तथा उनके गुरु (गुरुः) हैं।
🌿🌹🌹🌹🙏❤️🙏🌹🌹🌹🌿

04/10/2026

Krishnaa...
Krishna he Krishna Anand

🙏 भगवान विष्णु सहस्रनाम: 49/50 🙏सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ४९॥स्वा...
04/10/2026

🙏 भगवान विष्णु सहस्रनाम: 49/50 🙏

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥ ४९॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ ५०॥।

~ उन भगवान विष्णु को प्रणाम जो हैं सुव्रतः (Suvratah): श्रेष्ठ और पवित्र व्रतों (नियमों) का पालन करने वाले या भक्तों के लिए सुलभ व्रत वाले, सुमुखः (Sumukhah): सुंदर और प्रसन्न मुख वाले, जो सदैव भक्तों पर कृपा बरसाते हैं, सूक्ष्मः (Sookshmah): अत्यंत सूक्ष्म, जिन्हें केवल ज्ञान या इंद्रियों से परे जाकर ही अनुभव किया जा सकता है, सुघोषः (Sughoshah): सुंदर और गंभीर ध्वनि वाले (जैसे वेदों की ध्वनि या शंखनाद), सुखदः (Sukhadah): सत्पुरुषों को सुख देने वाले और दुष्टों के सुख का नाश करने वाले, सुहृत् (Suhrit): बिना किसी स्वार्थ के सभी जीवों का भला चाहने वाले (परम मित्र), मनोहरः (Manoharah): अपने असीम सौंदर्य और रूप से मन को हर लेने (आकर्षित करने) वाले, जितक्रोधो (Jitakrodhah): जिन्होंने अपने क्रोध पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है, वीरबाहुर् (Veerabaahur): अत्यंत पराक्रमी और शक्तिशाली भुजाओं वाले, विदारणः (Vidaaranah): अधर्मियों और दुष्टों का संहार (विदारण) करने वाले।

~~ उन भगवान विष्णु को प्रणाम जो हैं स्वापनः (Swaapanah): प्रलय के समय सभी जीवों को अपनी माया से योगनिद्रा (गहरी नींद) में सुलाने वाले, स्ववशः (Swavashah): जो पूरी तरह स्वतंत्र हैं और केवल अपने वश में हैं (सर्वतंत्र स्वतंत्र), व्यापी (Vyaapee): आकाश की तरह हर स्थान और हर कण में समाए हुए (सर्वव्यापी), नैकात्मा (Naikaatmaa): सृष्टि के कल्याण के लिए अनेक रूपों (अवतारों) में प्रकट होने वाले, नैककर्मकृत् (Naikakarmakrit): सृष्टि की रचना, पालन और संहार जैसे अनेक प्रकार के अलौकिक कार्य करने वाले, वत्सरः (Vatsarah): समय या वर्ष के रूप में निवास करने वाले (काल स्वरूप), वत्सलः (Vatsalah): अपने भक्तों से माता की तरह अगाध प्रेम करने वाले (भक्तवत्सल), वत्सी (Vatsee): सभी जीवों (बच्चों/बछड़ों) के पालनकर्ता या पिता स्वरूप, रत्नगर्भः (Ratnagarbhah): जिनके गर्भ (भीतर) में रत्न और ब्रह्मांड की समस्त निधियाँ छिपी हैं (जैसे समुद्र या पृथ्वी), धनेश्वरः (Dhaneshwarah): समस्त धन, ऐश्वर्य और संपदा के परम स्वामी।
🌹🌹🌹🙏❤️🙏🌹🌹🌹

🌺 भगवान विष्णु सहस्रनाम: 47/48 🌺अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः।नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः॥ ४७॥...
02/10/2026

🌺 भगवान विष्णु सहस्रनाम: 47/48 🌺

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः॥ ४७॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४८॥
~~ प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं अनिर्विण्णः जो कभी खिन्न, उदास या निराश नहीं होते, स्थविष्ठः जो अतिशय स्थूल या विराट रूप वाले हैं, अभूत्: जो प्रकट हुए हैं या स्वरूपवान हैं, धर्मयूप: जो धर्म रूपी यूप (यज्ञ का खंभा) के समान हैं, महामखः जो स्वयं महान यज्ञ रूप हैं, नक्षत्रनेमि: जो नक्षत्रों और चक्रों के नियंत्रक व केंद्र हैं, नक्षत्री: जो नक्षत्रों (तारों या चंद्रमा) के स्वामी हैं, क्षमः जो सहनशील और समर्थ हैं, क्षामः जो प्रलय के समय सबका क्षय करने वाले हैं या कृश (सूक्ष्म) रूप वाले हैं, समीहनः जो शुभ कर्मों की चेष्टा करने वाले या भक्तों की इच्छा पूरी करने वाले हैं, यज्ञः जो स्वयं यज्ञ रूप हैं, इज्यः जो यज्ञ में पूजनीय हैं, महेज्यः जो सबसे अधिक पूजनीय और श्रेष्ठ हैं, क्रतुः जो क्रतु (विशेष यज्ञ) रूप हैं, सत्रम्: जो दीर्घकालीन सत्र यज्ञ रूप हैं, सतां गति: जो सज्जनों की एकमात्र गति (आश्रय या मोक्ष) हैं, सर्वदर्शी: जो सब कुछ देखने वाले (सर्वज्ञदृष्टि) हैं, विमुक्तात्मा: जो संपूर्ण बंधनों से मुक्त परमात्मा हैं, सर्वज्ञ: जो सब कुछ जानने वाले हैं, ज्ञानमुत्तमम्: जो सर्वोत्तम ज्ञान स्वरूप हैं।
🕉️🌹🌹🌹🙏❤️🙏🌹🌹🌹🕉️

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 45/46 🕉️ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ४५॥...
02/10/2026

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 45/46 🕉️

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ ४५॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ ४६॥

~ प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं ऋतुः जो स्वयं ऋतु (मौसम) रूप हैं, सुदर्शनः जिनके दर्शन अत्यंत शुभ, सुंदर और कल्याणकारी हैं, कालः जो समय (काल) के रूप में सबको नियंत्रित करते हैं, परमेष्ठी: जो परम स्थान (वैकुण्ठ या हृदय आकाश) में स्थित हैं, परिग्रहः जो सबको सब ओर से अपने में समेटे हुए हैं या भक्तों के रक्षक हैं, उग्रः: जो दुष्टों के लिए भयंकर/प्रबल हैं, संवत्सरो: जो संवत्सर (वर्ष/समय) रूप हैं, दक्षः जो संपूर्ण कार्यों में अत्यंत चतुर और कुशल हैं, विश्रामो: जो सबको शांति और विश्राम देने वाले हैं, विश्वदक्षिणः जो संपूर्ण जगत में सबसे अधिक दक्ष, उदार और कार्यकुशल हैं।
~~ प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं विस्तारः जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड के रूप में विस्तृत/फैले हुए हैं, स्थावरस्थाणुः जो वृक्ष आदि की तरह अचल (स्थावर) और सुमेरु आदि की तरह स्थिर व अडोल (स्थाणु) हैं, प्रमाणं: जो संपूर्ण जगत के सत्य ज्ञान के प्रमाण/माप हैं, बीजमव्ययम्: जो इस संसार के अविनाशी और शाश्वत कारण (बीज) हैं, अर्थोऽ: जो सबके द्वारा प्राप्त करने योग्य, पूज्य या लक्ष्य (अर्थ) हैं, अनर्थो: जो समस्त बंधनों और अनर्थों (दुखों) से रहित व परे हैं, महाकोशो: जो महान कोश (अन्नप्राण आदि पाँचों कोषों) से युक्त या जिनके भीतर महान खजाना है, महाभोगो: जो महान भोग (ऐश्वर्य व आनंद) के भोक्ता या प्रदाता हैं, महाधन: जो अपार और महान धन (ज्ञान-ऐश्वर्य) से संपन्न हैं।
🌿🌹🌹🌹🌺🙏❤️🙏🌺🌹🌹🌹🌿

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 43/44 🕉️रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ...
01/10/2026

🕉️ भगवान विष्णु सहस्रनाम: 43/44 🕉️

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥ ४३॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ ४४॥

~ प्रणाम उन भगवान विष्णु को जो हैं रामः (राम): जो अपनी दिव्य सुंदरता और गुणों से सबको आनंदित करते हैं और जिनमें योगी रमण करते हैं, विरामः (विराम): जो सभी जीवों के अंतिम आश्रय हैं, जहाँ संसार चक्र का अंत (विराम) होता है, विरजः (विरज): जो सांसारिक वासनाओं, रजोगुण और सभी प्रकार की अशुद्धियों से रहित (पवित्र) हैं, मार्गः (मार्ग): जो मुमुक्षुओं (मोक्ष चाहने वालों) के लिए परम पद को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग हैं, नेयः (नेय): जो सच्चे भक्तों द्वारा ज्ञान के माध्यम से आसानी से संचालित या प्राप्त किए जा सकते हैं, नयः (नय): जो न्याय के रूप में सबको सही दिशा में ले जाते हैं, अनयः (अनय): जिन्हें आगे ले जाने वाला (उनका कोई स्वामी) कोई नहीं है, वे स्वयं ही सबके नियंत्रक हैं, वीरः (वीर): जो अत्यंत पराक्रमी और शक्तिशाली हैं, शक्तिमतां श्रेष्ठः (शक्तिमतां श्रेष्ठ): समस्त शक्तिशालियों (जैसे इंद्र, वायु आदि) में जो सबसे श्रेष्ठ और परम शक्तिशाली हैं, धर्मः (धर्म): जो स्वयं साक्षात धर्म के स्वरूप हैं, क्योंकि वे ही सभी प्राणियों को धारण करते हैं, धर्मविदुत्तमः (धर्मविदुत्तम): धर्म को जानने वालों में जो सबसे श्रेष्ठ हैं (जिन्होंने वेद और शास्त्रों के रूप में धर्म की मर्यादा स्थापित की)।

~~ बारम्बार प्रणाम भगवान विष्णु को जो हैं वैकुण्ठः (वैकुण्ठ): जो ब्रह्मांड की रचना के समय पंचभूतों को आपस में मिलाते हैं ताकि वे परस्पर टकराएं नहीं (या जिनका परम धाम वैकुंठ है), पुरुषः (पुरुष): जो इस ब्रह्मांड रूपी शरीर में निवास करते हैं और जो काल से भी परे सनातन हैं, प्राणः (प्राण): जो सभी जीवित प्राणियों के भीतर जीवन-शक्ति (प्राण) के रूप में स्पंदित होते हैं, प्राणदः (प्राणद): जो जीवन देने वाले हैं (और भक्तों के दुखों का नाश करके उन्हें जीवन दान देते हैं), प्रणवः (प्रणव): जो 'ॐ' (ओन्कार) स्वरूप हैं, जिसकी सभी वेदों में स्तुति की गई है, पृथुः (पृथु): जो ब्रह्मांड के रूप में अत्यंत विशाल और विस्तृत हैं, हिरण्यगर्भः (हिरण्यगर्भ): जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय सुवर्ण अंड (हिरण्यमय) के रूप में प्रकट हुए थे, जो सभी सृष्टियों के मूल कारण हैं, शत्रुघ्नः (शत्रुघ्न): जो देवताओं और धर्म के शत्रुओं (असुरों और दुर्गुणों) का नाश करने वाले हैं, व्याप्तः (व्याप्त): जो कारण के रूप में इस पूरे संसार के कण-कण में समाए हुए (सर्वव्यापी) हैं, वायुः (वायु): जो हवा के रूप में बहकर सब जीवों को जीवन और गति प्रदान करते हैं, अधोक्षजः (अधोक्षज): जिनका ज्ञान हमारी भौतिक इंद्रियों (आँख, कान आदि) से नहीं हो सकता, जो केवल अंतःकरण की शुद्धता से जाने जा सकते हैं और जो कभी नीचे नहीं गिरते (अच्युत हैं)।
🌿🌹🌹🌹🌺🙏❤️🙏🌺🌹🌹🌹🌿

Address

Allahabad
211019

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when श्रीकृष्ण भक्ति-साधना posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share